Sunday, September 20, 2009

डा. प्रमोद कुमार-परि‍चय

 डा. प्रमोद कुमार-परि‍चय

जन्म ति‍थि‍ : मई 30, 1956

शि‍क्षा : बी.ए. (दि‍ल्ली)
एम.ए. (राजनीति‍ शास्त्र)
एम.ए. (इति‍हास)
एलएल.बी. (दि‍ल्ली)
एलएल.एम. (दि‍ल्ली)
उपाधि‍पत्र अन्तर्राष्टीय वि‍धि‍ (दि‍ल्ली)
उपाधि‍पत्र औद्योगि‍क सम्बंध एवं कार्मि‍क प्रबन्ध (दि‍ल्ली)
एम.बी.ए. (मानव संसाधन), मुम्बई
पीएच.डी. (दि‍ल्ली)

अन्य प्रकाशन : 1) ``जफ़ाओं का मंज़र'' - कवि‍ता संग्रह सन् 1995
में प्रकाशित
2) समय पटल के अक्षर- कविता संग्रह-2008 में प्रकाशित

3) कच्चा मकान- कहानी संग्रह- 2008 में प्रकाशित

4) लगभग 250 से अधि‍क कहानी, लेख, कवि‍ताएँ एवं
अन्य रचनाओं का राष्ट्रीय पत्रि‍काओं और अनेक
प्रति‍ष्ठि‍त दैनि‍क पत्रों में प्रकाशन

योगदान : 1) ``ज्ञानोदय'' एवं ``नि‍र्मल'' नामक गैर-सरकारी
संगठनों का संचालन । पर्यावरण हि‍तैषी वातावरण
नि‍र्माण एवं साक्षरता को बढ़ाने हेतु सर्मपि‍त
2) शि‍क्षण संस्थाओं में अति‍थि‍-वक्ता के रूप वि‍वि‍ध
वि‍षयों पर सत्रों का संचालन

-: पता :-
drpkrbi@yahoo.co.in
---------------------http://drpramodkumar.blogspot.com/

समुद्र की लहरें-ड़ा प्रमोद कुमार

समुद्र की लहरें-ड़ा प्रमोद कुमार




एक बार मैं समुद्र के कि‍नारे एक उॅं€ची पत्थर की सि‍ला पर तन्हा बैठा लहरों को देख रहा था । लहरें जो उछल रही थी; कूद रही थी और पानी के थपेड़े खा-खा कर सि‍ला तक आती थी टकराती थी और फि‍र समुद्र में लौट जाती थी । चाँद-एक मि‍ट्टी का ढ़ेर दूसरों की चमक से रोशन; पर चंचल लहरें बेसुध होकर उसके आकर्षण में मानो पागल हो रही थी । खूब ऊँची उछलती थी मानों चाँद को छूने के लि‍ए लालायि‍त हो । इन लहरों की आवाजें मानो चाँद को पुकार-पुकार कर बुला रही हो । मैं इसे चाँद का आकर्षण कहूँ या लहरों का उसके प्रति‍ अन्धा प्रेम, मेरी समझ में कुछ भी नही आ रहा था । हाँ लहरों की ऊँची उछाल मुझे चाँद के प्रति‍ उनके अगाध प्रेम का अहसास जरूर दि‍ला रही थी । न तो वे सि‍ला से टकराने का दर्द महसूस कर रही थी और न ही समुद्र के पानी के थपेड़ों का ।

सि‍ला के पास आती लहरों से मैंने कहा, "ए लहरों ! क्या तुम पागल हो गई हो जो उस चाँद को चाह रही हो जि‍सके चेहरे पर दाग है ? क्यों ऐसी चाह मन में लि‍ए हो जो पूरी न हो सके? क्यो उसको पाने की अभि‍लाषा रखती हो जो सम्भव ना हो सके ? ऐसे तुम कभी कि‍नारा न पाओगी । जिंदगी भर पछताओगी ; थपेड़े खाओगी ।"

फुदकती लहरों ने मुस्करातेहुए कहा, "हे मानव ! लहर का जीवन चलने में है और कि‍नारा पाना तो रूकना है । चलते रहना ही जीवन है । प्रेम प्रेमी के चेहरे का दाग नही देखता और न ही यह देखता कि‍ प्रेमी एक मि‍ट्टी का ढ़ेर है । कौन एक दि‍न मि‍ट्टी का ढेर नहीं हो जाएगा? कौन मि‍ट्टी नही ? हर व्यक्ति‍ एक मि‍ट्टी का पुतला ही तो है । चाँद का आकर्षण उसके खि‍चाव में है जो मेरे तन-मन को पागल कर देता है और मैं उसके प्रेम में हर दर्द, हर थपेड़े भूल जाती हूँ । सुख, दु:ख और सांसारि‍क लालसाओं से ऊपर उठकर कभी प्रेम करके देखो । तुम्हें पता चलेगा कि‍ प्रेम एक सच्चा आनंद है, एक भक्ति‍ है, एक शक्ति‍ है, एक तृप्ति‍ है; जीवन की सम्पूर्णता है और आत्मि‍क सुख है ।"

ऐसा कहकर लहरें मेरी आंखों से दूर कही ओझल हो गई और मैं सि‍ला पर तन्हा बैठा सोचने लगा कि‍ क्यों सांसारि‍क सुख सुवि‍धा से युक्त होते हुए भी व्यक्ति‍ का जीवन सन्तुष्ट, तृप्त एवं आनन्दि‍त नहीं हो पाता ।

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प्रोफेसर बैरागी के कुत्ते-ड़ा प्रमोद कुमार

प्रोफेसर बैरागी के कुत्ते-ड़ा प्रमोद कुमार





मेरे परि‍चि‍त एक प्रोफेसर हैं, जि‍न्हें प्यार से लोग "प्रोफेसर बैरागी" कहकर बुलाते हैं । वैसे उनका नाम "टाइड़ा राम" है । परन्तु कोई भी उन्हें इस नाम से नहीं पुकारता । सब उन्हें "टेढ़ाराम" नाम सें जानते हैं । हाँ, यह बात अलग है कि‍ उसके सामने कि‍सी को उन्हें टेढ़ाराम कहने की हि‍म्मत नहीं । एक बार प्रोफेसर पाण्डे ने उन्हें "टेढ़ाराम" कहकर छेड़ दि‍या था। बैरागी साहि‍ब लगे बरसने - "प्रोफेसर पाण्डे आपको कि‍सने प्रोफेसर बना दि‍या । आप सही उच्चारण करना तो जानते नहीं। मेरा नाम प्रोफेसर टाइड़ाराम है, न किं टेढाराम । आप उच्चारण सीखने की कोई क्लास ज्वाइन कर लीजि‍ए आदि‍-आदि‍।"

लोगों ने प्रोफेसर बैरागी के क्रोध से डरके उन्हें 'टी, आर. बैरागी' पुकारना चालू कर दि‍या, लेकि‍न वे जब भी बोर्ड पर लि‍खते थे उनकी लि‍खाई उनके नाम को सार्थक कर देती थी । वे हमेशा टेढ़ा लि‍खते थे । यही नहीं, वे गर्दन भी टेढ़ी करके ही चलते थे । मैंने कई बार देखा कुछ मनचले स्टूडेंट उन्हें तंग करने के लि‍ए जब भी मि‍लते और "राम राम" करते धीरे से एक स्टूडेण्ट "टेढ़ाराम" जरूर फुसफुसाता ।

खैर ! दि‍न गुजरते गये और वे प्रोफेसर बैरागी के रूप में जाने जाने लगे ।

प्रोफेसर बैरागी अपराध कानून के शि‍क्षक हैं, लेकि‍न उन्हें कुत्तों से बहुत प्यार है । न जाने कि‍स - कि‍स नस्ल के कुत्ते उनके पास हैं । उन्हें वि‍श्ववि‍द्यालय परि‍सर में ही एक बड़ा मकान मि‍ला हुआ है, जहां वे अपने कुत्तों के साथ रहते हैं । कुत्तों के साथ वे इतने मस्त रहे कि‍ उन्हें पता भी नहीं चला कि‍ कब उनकी जि‍न्दगी के 45 सावन गुज़र गए । उन्हें शादी का ख्याल आया था, कोशि‍श भी की थी लेकि‍न उनकी गंजी खोपड़ी उनके आड़े आ गई । यही नहीं, वे चाहते भी थे 20-22 साल की कुवांरी कन्या, जो उन्हें न मि‍ल सकी । अब उनकी दुनि‍याँ उनके कुत्ते हैं । कुत्ते भी तरह-तरह के - पमेरि‍यन, बॉक्सर, बुलडॉग, हि‍पेट, कोली, पकि‍नीज, बोर्जोई, अलसेशि‍यन आदि‍ ।

कुत्तों से बैरागी जी का प्रेम इतना ज्यादा है कि‍ वे इनकी सेवा में खुद को भूल जाते हैं । पहले कुत्तों को खि‍लाते हैं फि‍र स्वयं खाते हैं । अपनी सारी तन्ख़ाह कुत्तों पर खर्च कर डालते हैं । इसलि‍ए पैसे की हमेशा उन्हें कि‍ल्लत रहती है । न जाने कि‍तनों से पैसा उधार ले रखा है । यहां तक कि‍ अपने भवि‍ष्य नि‍धि‍ से भी पैसा नि‍काल-नि‍काल कर कुत्तों पर खर्च कर डाला । उनका कुत्तों से प्यार एक जुनून बन गया है ।

एक बार बैरागी साहि‍ब मुझे कालि‍ज की लाइब्रेरी के बाहर मि‍ले और पूछने लगे, "अरे वि‍नोद ! तुम्हारे पास दो सौ रूपये हैं ।"

मैंने कहा, "कि‍सलि‍ए, प्रोफेसर साहि‍ब ।"

वे उदास मन से कहने लगे, "अरे वो हेमा है न, उसने कल से कुछ भी नहीं खाया है । वह बीमार है । उसे डाक्टर को दि‍खाना है ।"

एक तो प्रोफेसर और वह भी मेरे कालि‍ज के । मैंने तुरन्त दो सौ के नोट जेब से नि‍कालकर उनके हाथ में रख दि‍ये ।

कुछ दि‍नों बाद मैंंने सोचा - ``क्यों न प्रोफेसर साहि‍ब के घर चला जाये । चाहे जैसे भी हो, हैं तो प्रोफेसर । अपना पीएच. डी. का वि‍षय भी तो चुनना है । शायद इस वि‍षय में वे मेरी मदद कर सकें ।''

जब मैं उनके घर पहुँचा तो देखा कि‍ प्रोफेसर साहि‍ब अपने एक कुत्ते को नहला रहे थे । मुझे गेट पर देखते ही कहने लगे, ``आओ वि‍नोद ! देखों मेरी हेमा कैसे शांत है । कल इसे जुकाम हो गया था इसलि‍ए इसे गुनगुने पानी से नहला रहा हूँ । वि‍नोद, देखो कि‍तनी सुन्दर है । देखो इसकी प्यारी-प्यारी सी गहरी आँखें। जब यह चलती है तो सावन की फुहारों के गि‍रने की आवाजें सी आती हैं । देखो इसके रेशम जैसे बाल । देखो-देखो, छू कर देखो ।''

मैंने डरते-डरते उसको छुआ । बैरागी साहि‍ब कहने लगे, ``वि‍नोद ! मैं अपने हर बच्चे को सुपर लक्स से नहलाता हूँ । मेरे कुल दस बच्चे हैं । हेमा इनमें सबसे प्यारी है । हर रोज तीन कि‍लो मीट बाजार से लाकर उन्हें खि‍लाता हूँ । यहां गर्मी बहुत पड़ती है । मेरे बच्चे बहुत की नाजुक हैं । इसलि‍ए मैने इनके कमरे में ए.सी. लगवा दि‍या है ।लेकि‍न ये मुझे इतना प्यार करते हैं कि‍ ए.सी. रूम को छोड़कर हर रात मेरे पास आकर सो जाते हैं ।''

मुझे प्रोफेसर साहि‍ब की बातें सुनकर यह आभास हो गया कि‍ मैंने यहां आकर गलती की । मैंने बीच में ही टोककर कहा, ``सर, मैं आपसे शोध के वि‍षय पर कुछ सुझ़ाव लेना चाहता हूँ । मैं चाहता हूँ कि‍ "राजनैति‍क अपराधीकरण एवं भारतीय प्रजातन्त्र" वि‍षय पर शोध करूँ । क्या शोध के लि‍ए यह वि‍षय ठीक रहेगा'' ?

बैरागी जी तुरन्त बोले, "क्या बेकार का वि‍षय चुना है। अरे, तुम्हें कुछ ऐसा वि‍षय लेना चाहि‍ए जो आज के सन्दर्भ में सही उतरता हो। जि‍स पर लि‍खकर तुम अपराधों को रोकने के बारे में अपने सुझाव दे सको ।"

अपने एक कुत्ते की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "अरे टोडो, आओ बेटा ! आज मुझे ही तुम्हारी मालि‍श करनी पड़ेगी । रामू तो आज आया नहीं । कि‍तनी छुट्टि‍याँ मारता है । हजार रूपये महीना देता हूँ, फि‍र भी महीने में दस दि‍न गायब हो जाता है । देखो वि‍नोद, टोडो कि‍तना कमजोर हो गया है।"

एक कुत्ते को सहलाते हुए प्रोफेसर बैरागी जी फि‍र बोलने लग,े - ``वि‍नोद, कुत्ते बहुत ही समझदार प्राणी होते हैं । इनकी वफ़ादारी की मि‍सालें दुनि‍यां भर में मशहूर हैं । माँ-बाप, भाई-बहन, यार-दोस्त, बीबी-बच्चे सब द़गा दे सकते हैं लेकि‍न ये कुत्ते कभी अपने मालि‍क को धोखा नहीं देते । कुत्तों की सडंघने की शक्ति‍ बहुत प्रबल होती है । कुत्ते चतुर, मि‍त्रवत् और अच्छे साथी होते हैं और एक अर्से से इन्हें मनुष्य का श्रेष्ठ मि‍त्र कहा जाता रहा है । 'मोंग्रेल' कुत्ता सभी कुत्तों से अधि‍क चतुर होता है । कई जगह कुत्तों से भेड़ चराने का काम लि‍या जाता है । कुछ अंधे व्यक्ति‍ कुत्ता इसलि‍ए रखते हैं क्योंकि‍ वह उसे राह दि‍खाने में सहायता करता है । कुछ लोग कुत्तों को शि‍कार पर ले जाते हैं । कुत्ते पुलि‍स के खोज़-दस्ते के महत्वपूर्ण अंग हैं। । ये अपराधि‍यों को पकड़ने में पुलि‍स की सहायता करते हैं । कुत्ते कभी गहरी नि‍द्रा में नहीं सोते । सोते हुए भी वे सतर्क रहते हैं और थोड़ी सी आहट से जाग जाते हैं । व्यक्ति‍गत सम्बन्धों में जो बेवफाई आज देखने को मि‍लती है वह कुत्तों में नहीं है ।''

मैं प्रोफेसर साहि‍ब की बातें सुनकर बोर हो रहा था । उकता सा गया । मैंने फि‍र बीच मं टोकते हुए कहा - ``सर, कोई अच्छा वि‍षय बताइए ना जि‍सपर मैं शोध कर सकँडं ।''

प्रोफेसर साहि‍ब मेरी बात सुनकर कुछ सोचने लगे । और फि‍र बड़ें ही दार्शनि‍क अंदाज में बोले, ``तुम कुत्तों से सम्बन्धि‍त वि‍षय लो ।'' जैसे कि‍ "कुत्तों का अपराधि‍यों को पकड़वाने में योगदान" । हाँ वि‍नोद, यह वि‍षय ठीक रहेगा । तुम इस वि‍षय पर अच्छा शोध कार्य कर सकते हो । मैं तुम्हारी मदद करूंगा।"

"सर, पीएच.डी. के लि‍ए क्या यह वि‍षय ठीक रहेगा'' - मैंने हि‍चकचाते हुए कहा ।

"क्यों नहीं, शायद तुम नहीं जानते कि‍ कुछ कुत्ते दुसरे कुत्तों के मुकाबले बेहतर काम करते हैं । उनकी इसी कार्य वि‍शेष के लि‍ए नस्ल वि‍कसि‍त की जाती है । मसलन खरगोश व चूहों के शि‍कार के लि‍ए टेरि‍यर नस्ल तैयार की गयी है, गाय-भेड़-बकरी चराने के लि‍ए कोली नस्ल तथा जंगली जानवरों को खदेड़कर शि‍कार करने के लि‍ए बोर्जोई नस्ल के शि‍कारी कुत्ते वि‍कसि‍त हुए हैं । बैल-मारने जैसे क्रूर खेल में पहले पहल बुलडॉग का इस्तेमाल हुआ ।" - प्रोफेसर साहि‍ब मुढे समझने लगे ।

प्रोफेसर साहि‍ब बि‍ना रूके बोलते जा रहे थे, ``देखो वि‍नोद ! हम कुत्तों का एक फार्म हाउस बनाएंगे और अच्छी नस्लों की क्रॉस ब्रीडिंग कराकर एक नई नस्ल वि‍कसि‍त करेंगे, जो अपराधि‍यों का पकड़वाने में पूरा सहयोग कर सके । वि‍नोद, हम कुत्तों की एक ऐसी नस्ल वि‍कसि‍त करेंगे, जो वफादारी में ही नहीं बल्कि‍ समझदारी में भी आदमी से आगे हो । तुम चि‍न्ता मत करो । तुम्हारा शोध मैं ही पूरा कर दूंगा । बस तुम दो लाख रूपये का इन्तजाम कर लो । पहले हम फार्म हाउस के लि‍ए जमीन खरीदेंगे । फि‍र वि‍देशों से कुछ अच्छी नस्ल के कुत्ते मंगवायेंगे ।''

अब मेरी सहनशक्ति‍ जवाब देने लगी थी । मैंने उठते हुए कहा, "सर मुझे एक जरूरी काम है । मैं फि‍र कभी आऊंगा ।"

लेकि‍न बैरागी साहि‍ब कहां जाने देते। तुरन्त मेरा हाथ पकड़कर बैठाते हुए बोले, "अरे कहां जाते हो । बैठो, मैं तुम्हें कुत्तों की अच्छी नस्लों के बारे में बता रहा हूँ । जो अपराधि‍यों को पकड़वाने में बहुत सहायक होती हैं । एल्सेशि‍यन कुत्ते बहुत --- (प्रोफेसर साहि‍ब कुत्तों की नस्लों के बारे में बताने लगे ।)

मुझे अब उनकी बातों से अरूचि‍ होने लगी । लेकि‍न मैं उनको नाराज़ करके जाना भी नहीं चाहता था । मैंने दोहराया, ``सर आज मुझे जाना है । मैं फि‍र कभी आउं€गा, तब इत्मीनान से कुत्तों की नस्लों के बारे में और जानकारी प्राप्त करूंगा ।''

प्रोफेसर बैरागी जी समझ गए कि‍ अब मैं रूकने वाला नहीं । इसलि‍ए बोले, "सुनो तुम्हारी जेब में कि‍तने पैसे हैं ? जरा देखो । मुझे रूस्तम के लि‍ए चि‍कन लाना है । रूस्तम को चि‍कन बहुत पसन्द है । एक नर्म दरी भी लानी है, जि‍स पर आराम से मेरे बच्चे लेट सकें ।"

मैंने पर्स नि‍काला और सौ रूपए का एक नोट उनकी ओर बढ़ाने लगा । लेकि‍न प्रोफेसर साहि‍ब को कुछ और रूपये भी मेरे पर्स में नज़र आ रहे थे । वे कहने लगे, ``वि‍नोद ! सौ रूपये मे आजकल क्या होता है । देखो कुल कि‍तने हैं ?''

मैंने कहा, "सर, कि‍ताबें खरीदने के लि‍ए आज घर से 500 रूपये मांगे थे । दस-बीस रूपये फुटकर हैं ।"

"ठीक है । फुटकर तुम रखो । तुम्हारे बस के कि‍राये के काम आयेंगे । अभी 500 ही दे दो ।" ऐसा कहते हुए उन्होंने 500 रूपये मेरे पर्स से नि‍कालकर पर्स मुझे वापि‍स कर दि‍या ।

मैं सकपका गया । अब जल्दी-जल्दी वहां से चलने लगा । तभी पीछे से प्रोफेसर साहि‍ब की आवाज़ आई, "वि‍नोद कल जरूर आना । मैं तुम्हें कुत्तों की महत्वपूर्ण नस्लों के बारे में बतलाउं€गा । तुम्हारी पीएच.डी. पूरी हो जायेगी । लेकि‍न याद रखना इस वि‍षय पर शोध करने के लि‍ए कुत्तों का एक फार्म हाउस बनाना जरुरी है । और सुनो फार्म खरीदने के लि‍ए पैसे का इंतजाम जल्दी से जल्दी करके मुझे बताना।"

मैं तेजी से कदम भरते हुए प्रोफेसर साहब के परि‍सर से बाहर आ गया । बाहर आकर राहत की सांस ली और प्रण कि‍या कि‍ प्रोफेसर टेढ़ाराम बैरागी के घर मैं अब कभी नहीं जाउंगा और न उनसे मि‍लूँगा ।

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नि‍र्मल-ड़ा प्रमोद कुमार

नि‍र्मल-ड़ा प्रमोद कुमार

एक व्यक्ति‍ था, जि‍सका नाम था नि‍र्मल। वह हर सुबह नदी में स्नान कर शि‍व की पूजा करता और शि‍वलिंग पर गंगा जल चढ़ाता । तदुपरान्त अपने सांसारि‍क क्रि‍याकलापों में जुट जाता था । उसकी एक कि‍रयानें की दुकान थी, जहां लोग अपनी रोज़ की जरूरतों का सामान खरीदने आते थे । उसकी एक ही चाह थी कि‍ वह लखपति‍ बने, खुब पैसे कमाये और इस चाह को पूरा करने के लि‍ए वह दि‍न में कई बार झूठ बोलता था, कम तौलता। चावल में कंकड़ और न जाने कि‍स - कि‍स में क्या-क्या मि‍लावट करता, जि‍ससे उसे ज्यादा फ़ायदा हो । अपनी पैसे की भूख मि‍टाने के लि‍ए उसने कभी न तो कि‍सी की भूख की चि‍न्ता की और न ही कि‍सी के बीमार होने की । हां नि‍त्य सुबह नदी में स्नान कर गंगाजल लाना वह कभी नहीं भूला । क्योंकि‍ शि‍व की पूजा कर वह हर रोज शि‍वलिंग पर गंगाजल जरूर चढ़ाता था । बि‍ना गंगाजल चढ़ाये उसकी पूजा सपूर्ण नहीं होती थी । भगवान से वह हमेंशा एक ही प्रार्थना करता कि‍ वह खूब अमीर बने । उसके पास पैसा ही पैसा हो ।

एक बार जब वह नदी से जल ले रहा था, तो उसे लगा कि‍ गंगा का जल साफ नहीं है ।उसे वह जल अपने आराध्य देव पर चढ़ाना उचि‍त नहीं लगा । मन ही मन उसने उन लोगों को गालि‍यां दीं, जो गंगा के पानी को दूषि‍त करते हैं । उसके मन में आया क्यों न आराध्य देव पर चढ़ाने के लि‍ए वह स्वच्छ जल लाये । शायद दूषि‍त जल चढ़ाने से ही उसके आराध्य देव उससे प्रसन्न नहीं होते और इसी कारण वह अभी तक लखपति‍ नहीं बन पाया है।
उसने एक खाली पड़ा कनस्तर लि‍या और पहाड़ों की ओर चल दि‍या, जहां से नदी नि‍कलती है, लेकि‍न वहां भी उसे कुछ लोग नदी में स्नान करते, वस्त्र धोते नज़र आयें । उसने सोचा यहां भी स्वच्छ जल नहीं मि‍लेगा, इसलि‍ए वह ऊंची पहाड़ि‍यों को पार करता हुआ एक ऐसे नि‍र्जन स्थान पर पहुंचा, जहां एक स्वच्छ एवं नि‍र्मल जल का सरोवर था । सरोवर का पानी आइने की तरह साफ था । वह खुश होकर बोला, `आखि‍र मुझे अपने आराध्य देव पर चढ़ाने के लि‍ए नि‍र्मल जल मि‍ल ही गया । अब मेरे देव मुझ पर प्रसन्न हो जायेंगे और मेरी मनोकामना पूरी कर देंगे । मुझे लखपति‍ बना देंगे ।'

उसने कनस्तर पानी से भरा और उसे कि‍नारे पर रखकर सोचने लगा, `क्यों न मैं भी इस स्वच्छ सरोवर में नहा लूं । नहाकर मैं भी साफ हो जाउं€गा ।'

लेकि‍न नहाकर जैसे ही उसने सरोवर को मुड़कर देखा, तो पाया कि‍ सरोवर का सारा पानी गन्दा हो गया था तभी सरोवर से आवाज आयी, `अरे मुर्ख ! तुम्हारे जैसे नि‍म्न एवं संकीर्ण वि‍चार वाले लोग ही इस संसार को दूषि‍त करते हैं । स्वच्छता की खोज करने वाले गंदे मानव । पहले स्वच्छ रहना सीखो ! जो दूसरों को दूषि‍त कर खुद स्वच्छ होने का ढ़ोंग करते हैं, वे वास्तव में पवि‍त्र नहीं होते । तुमने अपनी संकीर्ण मानसि‍कता से झुठ का दामन पकड़कर दूसरों को धोखा दि‍या है

अपनी सांसारि‍क इन्छाए पूरी करने के लि‍ए दूसरो को दू:ख दि‍या है । जैसे तुम्हारे शरीर की गंदगी ने सरोवर के नि‍र्मल जल को गंदा कि‍या है, वैसे ही तुमने अपनी तुन्छ मानसि‍कता से सारे समाज को गंदा कि‍या है । क्या दुषि‍त मन से आराध्य देव की पूजा सफल हो सकती है ? याद रखो, मन की शुद्धता का होना बाह्य शारीरि‍क श्ुद्धता रखने से ज्यादा जर€री है । स्वच्छ मानसि‍कता तन को नही, सारे वातावरण को स्वच्छ रखने के लि‍ए प्रेरि‍त करती है । व्यक्ति‍ का महत्व नि‍र्मल जल से नहाकर स्वच्छ होने से नहीं, बल्कि‍ इससे है कि‍ उसने कि‍तनी नि‍र्मलता फैलायी है एवं समाज को स्वच्छ रखने में कि‍तना योगदान दि‍या है । कि‍तना उसने दूसरों को स्वस्थ एवं साफ रखने में योगदान दि‍या है । बि‍ना मन के शुद्ध कि‍ये, शुद्ध जल चढ़ाने से न तो आराध्य देव ही प्रसन्न होंगे और न ही शुद्ध जल से नहाने से व्यक्ति‍ ही पवि‍त्र होगा ।'

ये बाते सुनकर नि‍र्मल चुपचाप स्वच्छ पानी से भरा कनस्तर वहीं छोडकर घर वापस आ गया । अब न तो कभी वो कम तौलता था, न ही मि‍लावट करता । अब उसमें लखपति‍ बनने की चाह भी नहीं थी । अब स्वच्छता उसने अपने मन में पा ली थी । उसे लगने लगा कि‍ उसके आराध्य देव उसके मन में बस गये हैं । अब वह बस एक ही बात बार-बार कहता था -

'मन नि‍र्मल तो धरती नि‍र्मल,
नि‍र्मल सारा आकाश ।
सत्य, प्रेम भरा जि‍स मन में
आराध्य देव का उसमें वास ।।'

Email: drpramod.kumar@yahoo.in

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नलनी-ड़ा प्रमोद कुमार

नलनी-ड़ा प्रमोद कुमार





नलनी इतनी सुन्दर तो नहीं थी पर उसका लम्बा कद और उसपर भरा हुआ शरीर हर कि‍सी को आकर्षि‍त कर सकता था । उसका शरीर का रंग कुछ गहरा गेहुआ था पर उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखें कि‍सी को भी एक बार उसे देखने को मज़बूर कर सकती थी । नाक बेशक थोड़ी चपटी सी थी पर उसके लम्बे, घने और काले बाल देखने में अच्छे लगते थे । जबभी वह साड़ी पहनकर चलती, उसकी लम्बी चोटी कमर के नीचे तक लहराती थी । उसकी मुसकराहट कि‍सी को भी उसकी और खींचनें के लि‍ए काफ़ी थी । वह दक्षि‍ण भारत के सेलम नामक जि‍ले की थी।

उससे मेरी पहली मुलाकात चार्टटर्ड बस में हुई । मेरा ऑफि‍स नेरीमन पाइन्ट पर था और उसका ऑफि‍स दादर में । हम दोनों गोरेगॉव में रहते थे । अक्सर हम साथ-साथ ही बस में सफ़र करते। पूरे रास्ते घर-बाहर की बातें करते । यह रोज़ का सफ़र कब इतना करीब ले आया, हमें पता भी नहीं चला। नलनी 22-23 साल की कुंआरी लड़की थी । हम `दादर बीच' पर घंटों बैठे रहते । कभी हाथ में हाथ ले समुद्र के कि‍नारे-कि‍नारे घुमते तो कभी साथ-साथ भेल-पूरी खाते ।

नलनी एक मध्यम परि‍वार की लड़की थी । उसकी दो अन्य बहनें भी कि‍सी ऑफि‍स में कार्यरत थी। उसका पि‍ता शराबी था जो न तो कभी अपनी बेटि‍यों की चिंता करता न ही उससे उसे कोई उम्मीद थी ।

धीरे-धीरे मेरे सम्बन्ध उससे भावनात्मक रुप से प्रगाढ हो गए । हम जब भी बाहर जाते मैं उसे कुछ उपहार खरीद कर दे देता । कभी हेन्ड बेग, कभी चाबी का रिंग तो कभी सलवार सूट । एक दि‍न उसे एक साड़ी पसन्द आई । साड़ी महंगी थी लेकि‍न मैंने खरीद दी ।

एक दि‍न शामको हम `जुहू बीच' पर टहल रहे थे । उसने बताया, ``दीपक, कल मेरी मगंनी हो गई । अगले महि‍ने ही 20 तारीख को मेरी शादी है ।''

मैंने आश्चर्य चकि‍त होकर कहा, ``लेकि‍न तुमने मुझे पहले नहीं बताया ?''

``क्या बताती ? तुम्हें बुरा लगता । तुम शादी शुदा हो लेकि‍न तुम्हारी दोस्ती मैं छोड़ नहीं सकती । मैं तुम्हें चाहती हूँ; तुम्हें प्यार करती हूँ । मुझे डर था कि‍ कहीं तुम्हें खो न दूँ ।'' उसने कहा ।

मुझे अच्छा तो नहीं लगा लेकि‍न अपनी भावनाओं को छुपाकर चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा ।

मैं नलनी से भावनात्मक रूप से बँधा था । इसलि‍ए जब भी हम शामको मि‍लते, मुझे अच्छा लगता ।

एक शामको हम दादर मार्कि‍ट में घूम रहे थे । उसे गले की एक माला पसंद आई । माला पाँच हजार की थी । उसके पास पैसे नहीं थे । वह बोली, ``मेरे पास क्रेडि‍ट कार्ड है ।'' लेकि‍न दुकानदार ने ``क्रेडि‍ट कार्ड'' से पेमेंट लेने से मना कर दि‍या । मेरी ज़ेब में पैसे थे । मैंने पेमेंट कर दी । नलनी ने मुसकराते हुए कहा, ``बहुत अच्छी माला है । दीपक तुम मुझे पहनाओ ।''

मैंने माला उसके गले में पहना दी । वह बहुत खुश थी और मैं भी उसके खुश होने में खुश था ।

एक दि‍न हम `मरीन ड्राइव' पर बैठे थे । उसने मेरी आँखो में अपनी आँखें डालकर कहा, ``दीपक तुम बहुत अच्छे हो । आज़ के जमाने में अपने भी मदद नहीं करते लेकि‍न तुम हमेशा मेरी मदद करने के लि‍ए तत्पर रहते हो । जानते हो शादी के लि‍ए बहुत तैयारी करनी है । खाने का इंतज़ाम, टैंट-तम्बू का इंतज़ाम और खरीदारी । मेरे पास न गहनें है और न ही अच्छे कपड़े । तुम जानते हो पि‍ताजी के पास कोई पैसा-वैसा नहीं है । सब मुझे ही करना पड़ेगा ।''

मैं उसके पि‍ता को जानता था । वह कभी इसी कम्पनी में काम करता था जि‍समें मैं अब करता हूँ । नि‍हायत ही पि‍यक्कड़ कि‍स्म का आदमी था वो । जाने कि‍तने व्यक्ति‍यों से उसने पैसे उधार ले रखे थे । मैंने बीच में ही टोकते हुए कहा, ``मेरे सेविंग खाते में कुछ पैसे पड़े है । वे इस वक्त तुम्हारे काम आ सकते है ।''

नलनी चुपचाप सुनती रही। कुछ नहीं बोली । अगले दि‍न मैंने उसे 30 हज़ार रुपये लाकर दे दि‍ये ।उसने पैसे लेते हुए कहा, ``लेकि‍न मैं तुमसे इतने पैसे कैसे ले सकती हूँ ?''

``रख लो । कपड़े आदि‍ खरीद लेना ।'' मैंने जवाब दि‍या । उसने वे पैसे अपनी पर्स में रख लि‍ए ।

मैंने जि‍दंगी में पैसे को कभी महत्व नहीं दि‍या बल्कि‍ हमेशा सच्चा प्यार, दोस्ती और इन्सानि‍यत को आपस के सम्बन्धों को कायम रखने के लि‍ए जरुरी समझा । मैंने कभी नहीं चाहा कि‍ मेरी वजह से कि‍सी का दि‍ल दु:खे । शायद यही भावनाएँ मेरे लि‍ए नलनी को पैसा देने का कारण बन गई ।

मेरा ट्रांसफर मुम्बई से बंगलोर हो गया । नलनी की भी शादी हो चुकी थी । उसका पति‍ बैंक में एक अधि‍कारी था ।

एक साल बाद मैं ऑफि‍स के कार्य से मुम्बई आया । वहां मैं प्लाज़ा होटल में ठहरा । मुझे अचानक नलनी की याद आई । सोचा क्यों न उसका हालचाल जाना जाए । नलनी के ऑफि‍स का पी.आर.ओ. मेरा दोस्त था । मैंने उसे फोनकर होटल में बुला लि‍या । उसका नाम संजय भटनागर था । संजय सायं आ गया । पहले तो हमने एक दूसरे का हालचाल पूछा फि‍र साथ-साथ `डीनर' करने लगे । बातों ही बातों में मैंने संजय से नलनी के बारे में पूछा।

उसने बताया, ``अरे दीपक, वह तो ऐश कर रही है । मर्दों को पटाने में तो वह माहि‍र है । उसने बॉस को पटाकर पदोन्नति‍ ले ली है । वह अब बड़ी ऑफि‍सर बन गई है । बोरीवली में उसने अपना एक फलैट खरीद लि‍या है ।''

मैंने चकि‍त होकर पूछा, ``लेकि‍न संजय, केवल एक साल में उसके पास इतने पैसे कहाँ से आ गए ।''

संजय ने तुरंत जवाब दि‍या, ``पैसे देने वाले बेवकूफ़ मर्द बहुत मि‍ल जाते हैं । हर मर्द की कमज़ोरी होती है औरत । औरत का क्या बि‍गड़ता है । वह तो बस अपनी बदनामी से डरती है । यदि‍ उसे यह यकीन हो जाए कि‍ उसकी बात छुपी रहेगी तो वह कि‍सी के भी साथ जा सकती है ।''

कुछ देर बाद संजय चला गया । देर रात तक संजय की कही बातें मेरे कानों में गूजंती रही ।

अगली सुबह मैंने नलनी को उसके ऑफि‍स में फोन कि‍या । नलनी पहले तो मेरी आवाज़ सुनकर सकपका-सी गई; फि‍र बोली, ``हैलो दीपक ! क्या हाल है ।''

मैंने पूछा, ``नलनी, तुम कैसी हो ?''

उसने तुरंत जवाब दि‍या, ``मैं खुश हूँ । तुम कैसे हो ?''

मैंने कहा, ``मैं ठीक हूँ ।''

``बधाई हो, तुम एक बड़ी अधि‍कारी बन गई हो ।'' मैंने कहा ।

उसने हसँते हुए पूछा, ``क्या तुम्हारी पदोन्नति‍ हुई ?''

मैंने धीरे से जवाब दि‍या, ``नहीं ।''

और मैं चुप सा हो गया । तभी नलनी ने पूछा, ``तुम कहाँ ठहरे हो ?''

``प्लाजा होटल में '' मैंने उत्तर दि‍या ।

``क्या मैं आज रात तुम्हारे पास आऊँ ?'' उसने धीरे से पूछा। मैंने कहा, ``नहीं । क्या तुम्हे अपने पति‍ से काई डर नहीं लगता ?''

नलनी ने बेशर्मी से जबाब दि‍या, ``दीपक, तुम भरोसेमंद दोस्त हो । मैं ऑफि‍स के कार्य से बाहर जाने का बहाना बनाकर आ सकती हू । इसकी चिंता मत करो ।''

मैं उसकी स्पष्ट बातें सुनकर घबरा सा गया । मैंने तुरंत कहा, ``नहीं, यह खुद से और अपने जीवन साथी से धोखा होगा ।''
वह कुछ देर चुप रही और फि‍र बोली, ``लेकि‍न मैं तुम्हारे पैसे कैसे वापि‍स करुँगी ?''

मैं उसकी बातें सुनकर आश्चर्य चकि‍त हो गया। कुछ क्रोधि‍त होकर बोला, ``मेरे पैसे वापि‍स करने की कोई जर€रत नहीं।'' और मैंने गुस्से में रि‍सीवर रख दि‍या।

आज उन बातों को गुज़रे 15 साल बीत चुके है । न तो मैं कभी इस दौरान नलनी से मि‍ला और न ही उसके बारे में जानने की इच्छा हुई ।

लेकि‍न दो दि‍न बाद ही उसका एक फोन आया, फोन पर वह रो रो कर कह रही थी ``दीपक, मैं बड़ी मुसीबत में हूँ । मेरा पति‍ मुझे 10 साल पहले ही छोड़ गये । मुझे कैंसर हो गया । मैंने कैंसर के इलाज़ में सब कुछ गवाँ दि‍या है। मैं जि‍दंगी में अकेली रह गई हूँ । कृपया मेरी मदद करो ।''

पता नहीं मुझे क्या हुआ । मैंने उसकी बातें सुनकर तुरंत टेलि‍फोन काट दि‍या । मुझे नलनी से नफ़रत सी हो गई थी ।

लेकि‍न एक साल बाद संजय का फोन आया । नलनी मर चुकी थी ।

आज जब भी मैं नलनी के बारे में सोचता हूँ तो मेरे अन्दर बैठा व्यक्ति‍ हमेशा मुझे धि‍कारते हुए कहता रहता है, ``दीपक, बेशक नलनी बेवफ़ा थी लेकि‍न तुम तो अपने आपको बहुत बड़े आदर्शवादी इन्सान कहते हो । तुम तो स्वयं को उसका दोस्त कहते थे । क्या तुमने नलनी के साथ अपनी दोस्ती का फर्ज़ नि‍भाया ?''
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दो मांए एक बेटा-ड़ा प्रमोद कुमार


दो मांए एक बेटा-ड़ा प्रमोद कुमार

दुनि‍यां में कोई सबसे अनमोल चीज है तो वह है मां । मां अपने बेटे के लि‍ए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है । रात-रात जागकर उसे पालती है । बच्चे की खुशी में खुश होती है और उसके दुख में दुखी । वह भाग्यहीन होता है जि‍सकी मां उसके पास नहीं होती । मां के आंचल से ज्यादा शीतल छाया कोई नहीं दे सकता । उसके आशीर्वाद से भाग्य के बंद दरवाजे भी खुल जाते हैं । उसका प्यार अमूल्य होता है ।

बाप तो मेरा बचपन में ही गुजर गया था , बस थी तो बस एक मां जि‍सने मुझे पाल पोस कर बड़ा कि‍या । अपना पेट काट काट कर मुझे शि‍क्षा दी । उच्च शि‍क्षा के लि‍ए मुझे अमेरि‍का भेजा । आज मैं उसी की वजह से अपने पैरों पर खड़ा हूं और न्यूयार्क की एक फर्म में इन्जीनि‍यर के रुप में पदस्थ हूं ।

परदेश में मां की बहुत याद आती । कैसे वह मुझे स्कूल भेजती थी । मुझे बि‍ना खि‍लाए खुद खाना नहीं खाती थी । खुद की हर बड़ी- बड़ी ख़्वाहि‍शें मेरी छोटी -छोटी इच्छाओं की पूर्ति‍ के लि‍ए न्यौछावर कर देती थी । मुझे आज भी याद है वह बचपन की घटना जब मैंने एक चाबी वाला खि‍लौना खरीदने की जि‍द्द की थी । खि‍लौना बहुत महंगा था । लेकि‍न मां ने दि‍न रात लोगों के कपड़े सीलकर पैसे हकट्ठे कि‍ए और मेरे लि‍ए वह खि‍लौना लाकर दि‍या ।

मैं यह सब सोच ही रहा था कि‍ मुझे याद आया कि‍ इस 30 नवम्बर को मां अपने जिंदगी के 60 साल पूरे कर लेगी । मैंने सोचा, क्यों ने मां का यह जन्म दि‍न धूम धाम से मनाया जाए ।

और मैं मां के जन्म दि‍न की तैयारी में जुट गया । मैंने न्यूर्याक से ही लखनऊ के पांच सि‍तारा होटल का पूरा पार्टी हाल 30 नवम्बर के लि‍ए बुक करा दि‍या । पांच सौ व्यक्ति‍यो के खाने के लि‍ए भी अग्रि‍म राशि‍ जमा करा दी । एक बड़े केक के लि‍ए भी आर्डर दे दि‍या । अपनी टि‍कट भी लखनऊ के लि‍ए बुक करा ली । जन्म दि‍न पर मां व मेहमानों को देने के लि‍ए उपहार भी खरीद लि‍ए । इसके अति‍रि‍क्त मां के लि‍ए नई साड़ि‍या, सोने के आभूषण आदि‍ भी ले लि‍ए ।
भारत को प्रस्थान करने का दि‍न भी आ गया । मैं 28 नवम्बर को हवाई जहाज में सवार हो गया । कुछ घंटों में हवाई जहाज दि‍ल्ली पहुंच गया । वहां से मैंने लखनऊ के लि‍ए हवाई जहाज पकड़ा । ओर मैं 40 मि‍न्ट में ही लखनऊ पहुंच गया । मैंने एयरपोट से चैकआउ€ट कि‍या और अपना सामान लेकर बाहर की ओर नि‍कल पड़ा ।

मैं टैक्सी ढूंढ ही रहा था कि‍ मैंने एक औरत के रोने की आवाज सुनाई दी । मैं उसके करीब गया । औरत 60-65 साल की होगी । बाल सारे पके हुए और उस पर सफेद रंग की साड़ी । उसके पास एक लोहे का पुराना ट्रंक था जि‍सको पीटते हुए वह बि‍लख बि‍लख कर रो रही थी । उसके चारों ओर कुछ यात्री, टैक्सी चालक एवं एयरपोर्ट के कर्मचारी खड़े थे ।

मैंने एक व्यक्ति‍ से पूछा - ``भाई, क्या बात है ? ये बुढि‍या क्यों रो रही है।''

व्यक्ति‍ ने जवाब दि‍या, ``साहब, इसका इकलौता लङका इसे अकेला छोड़ कर अपनी पत्नी के साथ अमेरि‍का भाग गया ।``

मैंने बुढि‍या के पास जाकर पूछा, ``क्या बात है माता जी? क्या हुआ?''

उसने रोते हुए जवाब दि‍या, ``क्या बताऊं बेटा । मेरे बेटे ने मेरा सब घरबार और गहने बेच दि‍ए । कह रहा था - मां तुम हमारे साथ अमेरि‍का चलो । हम वहां तुम्हारी खूब सेवा करेंगे । जब मैं उनके साथ अमेरि‍का जाने यहां आई तो वे यह कहकर अंदर चले गए कि‍ हम पांच मि‍नट में टि‍कट लेकर आते हैं तुम यहीं बैठो । इस बात को दो घंटे बीत चुके हैं । हवाई जहाज जा चुका है । मेरा सब कुछ लूटकर मेरा बेटा और मेरी बहूं मुझे यहां अकेला छोड़कर चले गए । अब न मेरे पास रहने को कोई ठि‍काना है और न खाने को रोटी । मैं इस बुढा़पे में कहां जाऊं ।''

मुझे बुढि‍या पर तरस आ गया । कुछ कौमल भावनाओं की लहरें मन रुपी समुद्र में उफनने लगी । मैंने बि‍ना ज्यादा सोचे उसके पूछा, ``मां जी, मैं भी तो तुम्हारे लड़के जैसा हूंैं । तुम्हें अमेरि‍का ले चलूंगा । क्या तुम मेरे साथ चलोगी?''

बुढि‍या की आंखों में आंसू झलक आए । बस मेरे चेहरे को देखती रही । कुछ जवाब नही दि‍या । मैंने अपने सामान के साथ उसका सन्दुक भी टैक्सी की डि‍क्की में रखवा दि‍या और उसे टैक्सी में बैठाकर खुद भी उसमें बैठ गया । ड्राइवर को चलने का इशारा कि‍या । बुढि‍या सारे रास्ते चुप रही । शायद बुढापे में एक बेटे द्वारा दि‍या गया धोखा उसका मानसि‍क संतुलन बि‍गाड़ चुका था । उसकी मानसि‍क दशा ठीक नहीं थी । इसलि‍ए मैं भी चुप रहा । उससे कोई बात नहीं की ।

घर पहुंचकर मैंने इस नई मां को अपनी मां से मि‍लवाया । सब बातें मां को बताई । मां इस बेसहारा बुढि‍या को घर लाने पर खुश हुई ।

मैंने तीस नवम्बर को अपनी मां का जन्म दि‍न बड़ी धूम-धाम से मनाया । जन्मदि‍न की रोनक देखकर मेरी दोनो मांओं की आंखों में पानी भर आया ।

हम कुछ दि‍न लखनऊ में रहे और फि‍र मैं और मेरी दोंनो मांए न्यूर्याक के लि‍ए प्रस्थान कर गए ।

हवाई जहाज में मैंने अपनी नई मां से पूछा, ``मां जी, क्या तुम अमेरि‍का जाकर अपने लड़के से मि‍लना चाहोगी । ''

उसने गम्भीर होते हुए दृढता के साथ जवाब दि‍या - ``बेटा, मेरा वो बेटा तो उसी दि‍न मेरे लि‍ए मर गया था जब मुझे वह बेसहारा एयरपोर्ट पर छोङकर धोखे से चला गया था । अब तो तुम ही मेरे बेटे हो । तुम भाग्यशाली हो जो तुम्हें दो मांओं का आर्शीवाद मि‍ला है । वह अभागा है जो मां के होते हुए भी बि‍न मा का बेटा है ।''

और हम तीनों खुशी- खुशी न्यूर्याक में रहने लगे ।
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धुएं का आंचल-ड़ा प्रमोद कुमार


धुएं का आंचल-ड़ा प्रमोद कुमार



"चार बज चुके हैं और गाड़ी का नयी दि‍ल्ली स्टेशन से छूटने का समय पांच बजे है । आधा घंटे स्टेशन पहुंचने में भी लगेगा " - ऐसा सोचते हुए दि‍नेश अपनी अटैची में सफर का सामान जल्दी - जल्दी डालने लगा । आज दि‍नेश को आफि‍स के काम से भटिंडा जाना है । वहां अपनी कंपनी की एक ब्रांच खोलने के लि‍ए जगह देखनी है। दि‍नेश ने अटैची उठायी और घर से बाहर नि‍कल गया । सड़क पर आया और एक ऑटो में बैठते हुए कहा "नयी दि‍ल्ली स्टेशन चलो " ।

स्टेशन पहुंचते ही वह इन्क्वायरी खि‍ड़की पर आया और पूछा, "पंजाब मेल कि‍स प्लेट फार्म पर है ?" "ज़नाब पंजाब मेल 5 घंटे देरी से है । मथुरा में एक गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गयी है , इसलि‍ए सभी गाड़ि‍यां देरी से आ रही हैं ।" इन्क्वायरी बाबू ने एक सॉस में बता दि‍या ।

दि‍नेश ने अटैची को क्लॉक रूम में रखा और स्टेशन से बाहर नि‍कलने लगा तभी एक लड़की ने रोकते हुए पूछा "साहब, गाजि‍याबाद कौन सी गाड़ी जायेगी ?"

दि‍नेश ने एक नजर उसको देखा । लड़की 24-25 साल की होगी । चेहरा भी सुन्दर था । दि‍नेश उसे नि‍हार ही रहा था कि‍ उसने फि‍र प्रश्न कि‍या , "क्या आप बताने का कष्ट करेंगे ?"

दि‍नेश ने उत्तर दि‍या , "मैडम ! इन्क्वायरी खि‍डकी से पता करें ।"

लड़की फि‍र कहने लगी , "देखि‍ये मैं एक परेशान लड़की हूं और मेरे मां बाप भी नहीं हैं । मै

``तभी दि‍नेश ने बीच में ही टोक कर कहा , ``मैडम, मैं इसमें क्या कर सकता हूं ! आपको बताया तो है कि‍ मैं नहीं जानता गाजि‍याबाद कौन सी गाड़ी जायेगी । हां , आप इन्क्वायरी खि‍ड़की से पता कर लें !''

लड़की दि‍नेश के पीछे-पीछे चलती हुई बोली , ``मेरी कोई सहायता नही कर रहा है । मैं अकेली हूं और मुंबई से आयी हूं ।''

दि‍नेश मन ही मन सोचने लगा , "मेरी गाड़ी पांच घंटे लेट है और मुझे समय भी काटना है; क्यों न इससे बातचीत करके समय काटा जाए । उसकी ओर मुड़कर दि‍नेश कहने लगा , ``सुनो , मैं चाय पीने बाहर जा रहा हूं । तुम्हें कुछ खाना - पीना हैं ?''

वह चुप रही और दि‍नेश के साथ - साथ स्टेशन से बाहर आ गयी । वहां एक कॉफी हाउस मे बैठकर दोनों काफी पीने लगे ।

दि‍नेश ने पूछा, "क्या परेशानी है तुम्हें ? क्या तुम गाजि‍याबाद मे रहती हो ?"

"नहीं , मेरा नाम सुषमा कक्कड़ है और पंजाब के एक गांव की रहने वाली है । अभी मैं मुम्बई से आयी हूं "- वह कहने लगी ।

दि‍नेश को सुषमा कक्कड़ की पहेली समझ मे नही आ रही थी ।

उसको सुषमा के बारे में जानने की उत्सुकता हुई और पूछने लगा , "मुझे कुछ समझ में नही आ रहा हैं । तुम पंजाब की हो , मुम्बई से आयी हो । तुम झूठ तो नहीं बोल रही हो ?"

"नहीं , मैं झूठ नहीं बोल रही । मेरा बचपन जालंधर के पास चट्टी गांव में गुज़रा है । बाप बचपन में ही स्वर्ग सि‍धार गये । बुढी मां ने मुझे और मेरी बड़ी बहन को पाला । बहुत ही मुश्कि‍ल से मां ने बड़ी बहन की शादी रमेश तलवार से कर दी जो बहन को लेकर मुम्बई चले गये । मुम्बई में मेरे जीजाजी फि‍ल्मों के नि‍र्माण कार्य में लग गये । आप जानते होंगे उन्होंने `हम तुम', `प्यार का रि‍श्ता' , `दि‍ल का रि‍श्ता' जैसी कई फि‍ल्मे बनायी हैं ।" सुषमा अपने बारे में बोलती रही ।

कॉफी खत्म हो चुकी थी । दि‍नेश ने दो कप और कॉफी लाने के लि‍ए बैरे को बोला ।

सुषमा की आंखों में थोडा गीलापन था । वह अपने दि‍ल के दर्द के उजागर करते हुए कहने लगी , "साहब , मेरे जीजा जी की `दि‍ल तेरा दि‍वाना ' पि‍क्चर पि‍ट गयी और वह काफी कर्ज़े के दबाव में आ गये । पांच साल पहले वह गांव में आये और न जाने मां को दवाई के बहाने क्या पि‍लाया कि‍ वो मर गयी ।मैं अकेली लड़की , क्या कर सकती थी । मेरा सहारा अब केवल मेरी बहन और जीजा जी ही थे । इसलि‍ए मैं चाह कर भी मां की हत्या के लि‍ए जीजाजी को दोषी नही सि‍द्ध कर सकी । मां के मरने के बाद उन्होंने गांव की ज़मीन जायदाद बेच डाली और सब पैसे और मुझे लेकर मुम्बई आ गये । लगभग एक साल तो मेरी बहन और जीजा जी ने मेरा ख्याल रखा और उसके बाद मैं उन्हें बोझ लगने लगी । मेरे अपने जीजा जी ने मुझे फि‍ल्म में काम दि‍लाने के बहाने एक फाइनेन्सर के हवाले कर दि‍या । फाइनेन्सर ने मुझे अपने फायदे के लि‍ए उपयोग कि‍या । फि‍ल्म लाइन में अपना सम्पर्क बढ़ाने के लि‍ए और बड़े - बड़े नि‍र्माताओं एवं नि‍र्देशकों से फायदा उठाने लि‍ए मुझे कई जगह भेजा, जहां जाकर मुझे इन लोगों की कि‍स-कि‍स तरह सेवा करनी पड़ी मेरा दि‍ल ही जानता है ।
पहली बार मैंने बहुत संघर्ष कि‍या; बहुत चि‍ल्लायी लेकि‍न मेरी आवाज एक बंद कमरे में दब कर रह गयी ।इन इज्ज़़त वालों के समाज में एक अकेली लड़की की चीखें कोई नहीं सुन पाया । जब मैंने अपनी बहन से इस बारे में अपनी अनि‍च्छा प्रकट की तो बहन ने भी टाल दि‍या । मुझे लगा कि‍ मेरी बहन और मेरे जीजाजी दोनों ही मुझे बर्बाद करने में शामि‍ल थे । मैंने बहुत लोगों को अपनी दु:ख भरी कहानी सुनायी , लेकि‍न हर व्यक्ति‍ मुझ पर हंसता रहा और मुझमें केवल एक जवान लड़की को ही खोजता रहा । मै तंग आ कर घर से भाग गयी और मैने एक `बॉर ' में नौकरी कर ली । मै बारहवीं पास हूं । लेकि‍न अकेली लड़की को इसके अलावा मुम्बई में कोई और नौकरी क्या मि‍ल सकती थी ।"

अब तक सांय के 8 बज चले थे । दि‍नेश ने पूछा , "चलो खाना खाते हैं" और वे दोनों खाना खाने एक भोजनालय के लि‍ए नि‍कल पड़े । भोजनालय में जाकर दि‍नेश ने खाने का आर्डर दि‍या । खाना खाते-खाते वह बोलती रही , "बार की जिंदगी बहुत गंदी होती है । मैं रातभर जागती थी और सुबह सोती थी । न जाने कि‍न-कि‍न लोगों के साथ मुझे रात गुज़ारनी पड़ती थी । बार का मालि‍क मेरे से सब पैसे, जो भी मैं कमाई करती ले लेता था । हां , कुछ पैसे जो लोग खुशी से टि‍प देते थे वही मेरे पास रह जाते थे । बदले में बार का मालि‍क मुझे रहने और खाने को देता था । मैं इस जि‍न्दगी से तंग आ चुकी थी और इसलि‍ए मैं यहां आ गयी। "

दि‍नेश को उसकी बातों में कुछ सच्चाई महसूस हुई । दि‍नेश ने पूछा , "तुम्हारा कोई रि‍श्तेदार दि‍ल्ली में हैं ?" उसने बताया , "मेरे मामा जी पटेल नगर , दि‍ल्ली में रहते हैं। मैंने उनसे सहायता की प्रार्थना की थी लेकि‍न उन्होंने भी मुझे अपने पास रखने से मना कर दि‍या । "

दि‍नेश ने भोजनालय के टेलीफोन से उसके मामा से सम्पर्क कि‍या लेकि‍न उसने यह कह कर जवाब दे दि‍या कि‍ वह एक वेश्या को अपने घर रख कर घर को बर्बाद नहीं करना चाहता । दि‍नेश ने फि‍र सुषमा से पूछा, " क्या तुम कि‍सी के बच्चे की देखभाल कर सकती हो ? मेरे एक दोस्त हैं प्रदीप गुलाटी जि‍सको अपने बच्चे के लि‍ए एक आया की जरूरत है ।"

उसने तुरन्त उत्तर दि‍या , "मैं बच्चे को कैसे संभाल पाउं€गी ! यह कार्य मेरे स्तर का नहीं हैं । मेरा कैरि‍यर बर्बाद हो जायेगा । आप मेरे को कहीं एक कमरा दि‍लवा दें । मैं अकेले यदि‍ कि‍सी के पास कि‍राये पर रहने के
लि‍ए कमरा मांगने जाऊंगी तो कोई नहीं देगा । आप मेरे साथ चले और गाजि‍याबाद में एक कमरा कि‍राये पर दि‍ला दें । मैं मेहनत-मजदूरी करके खा लूंगी ।"

दि‍नेश ने तुरंत कहा , "तुम वहां भी बाजार लगा लोगी और वहां के वातावरण को दूषि‍त करोगी"। "नहीं , मैं अब आराम से रहना चाहती हूं । मैं उस जि‍न्दगी से तंग आ चुकी हूं । आप कुछ पैसे मकान के कि‍राये के लि‍ए दे देना जो मैं आपको बाद में वापि‍स कर दूंगी । बाकी खाने का खर्चा मैं खुद कुछ काम करके चला लूंगी । तुम कभी-कभी आते रहना ।" सुषमा ने कहा ।

दि‍नेश ने फि‍र कहॉ , "क्यों न तुम नारी नि‍केतन चली जाओ । मैं तुम्हें वहां भि‍जवा देता हूं ।"

उसने तुरंत जवाब दि‍या , "मैं नारी नि‍केतन नहीं जाना चाहती । वहां मेरी जि‍न्दगी बर्बाद हो जायेगी । न तो मैं कुछ कर पाऊंगी और न ही इस जि‍न्दगी में कुछ बन पाऊंगी ।"

9 बजे चुके थे । दि‍नेश अब सुषमा से पीछा छुड़ाना चाहता था । उसने सुषमा से कहा "मेरी गाड़ी का समय हो गया हैं । मुझे भटिंडा जाना हैं । पंजाब मेल 10 बजे आ जायेगी । मैं स्टेशन चलता हूं ।"

वह दि‍नेश के साथ-साथ चलती रही । उसने कहा , "मुझे भी भटिंडा ले चलो । भटिंडा में ही मुझे मकान दि‍ला देना ।"

दि‍नेश ने कहा , "मैं दफ्तर के काम से भटिंडा जा रहा हूं । मैं भटिंडा में नहीं रहता ।"

"मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी ।" सुषमा ने कहा ।

दि‍नेश ने जवाब दि‍या , "मुझे जालंधर अपने गांव जाना हो तो मै जालंधर का टि‍कट खरीद कर दे सकता हूं । मैं तुम्हें अपने साथ नहीं ले जा सकता । मैं शादीशुदा हूं । मेरे बच्चे हैं । मैं एक रखेल रख कर अपनी पत्नी एवं बच्चों को धोका नहीं दे सकता । मुझे माफ करों ।" सुषमा पीछा छोड़ ही नहीं रही थी । वह स्टेशन पर साथ-साथ चलती रही । दि‍नेश ने सि‍गरेट का पैकेट खरीदने के बहाने उससे पीछा छुड़ाने के लि‍ए कहां; "सुषमा , मैं सि‍गरेट का पैकेट खरीदने जा रहा हूं । तुम इस एक नंबर प्लेटफार्म पर ठहरो ।" ऐसा कह कर

दि‍नेश वहां से गायब़ हो गया और पंजाब मेल जो 9 नम्बर प्लेटफार्म पर खड़ी थी उसके कोच नम्बर चार में चढ़ गया । दि‍नेश बहुत थक गया था । बर्थ पर लेटते ही उस नींद आ गयी ।

सुबह जब गाड़ी सहारनपुर पहुंची तो उसने वहां चाय पी और अखबार खरीद कर पढ़ने लगा । अखबार में एक खबर पढ़कर वह हैरान हो गया । खबर में लि‍खा था कि‍ पांच हजार वेश्याएं मुम्बई में बम फटने एवं दंगे होने की वज़ह से वहां से बाहर चली गयी हैं ।

दि‍नेश को अब समझ आया कि‍ सुषमा भी उन्हीं पांच हजार वेश्याओं में से एक है जो मुम्बई मे रहती थी लेकि‍न वहां दंगा होने की वज़ह से मुम्बई से प्रस्थान कर गयी हैं ।



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छाया-माया-ड़ा प्रमोद कुमार


छाया-माया-ड़ा प्रमोद कुमार





बैंक की नौकरी में ज्यादा दि‍न तक एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरण होने से नही बचा जा सकता । मुझे भी ब्रांच मेनेजर बनाकर दि‍ल्ली से शि‍मला भेज दि‍या गया । पत्नी को साथ ले जाना सम्भव नहीं था क्योकि‍ वह दि‍ल्ली प्रशासन में अध्यापि‍क थी ।पत्नी एवं बच्चे को दि‍ल्ली में छोड़ मैंने शि‍मला की ब्रांच का चार्ज ले लि‍या । ब्रांच माल रोड पर थी ।दि‍न तो ब्रांच में कट जाता था पर सायंकाल अकेलापन खटकता था , इसलि‍ए मेंने शि‍मला वि‍श्ववि‍द्यालय में एम बी ए में दाखि‍ला ले लि‍या । क्लासें सांय 6.30 से 9 बजे की बीच लगती थी । जब क्लासें नही होती तो मैं पुस्तकालय में बैठकर पढ़ने लग जाता।कभी कभी कालि‍ज की केन्टीन में चाय पीने चला जाता ।

एक दि‍न में कालि‍ज की केंटीन में चाय पी रहा था तभी एक लड़की ने मेरे पास आकर पूछा, -शायद आप भी एम बी ए प्रथम वर्ष के छात्र है । मैंने भी आज ही दाखि‍ला लि‍या है । मेरा नाम माया है । क्या आप पि‍छले हप्ते के क्लास नोट्स मुझे एक दि‍न के लि‍ए दे सकते हैं ?''

ठहां क्यो नहीं, ये लीजि‍ए । बाई दि‍ वे,मेरा नाम मोहन है ।'' ऐसा कहते हुए मैंने अपने नोट्स उसे दे दि‍ये । हम दोनों ने साथ-साथ चाय पी और घर की ओर चल दि‍ए ।

माया का घर रास्ते में ही पड़ता था , सरकुलर रोड़ पर । वह अपने घर चली गई । क्लास के बाद अक्सर रोज़ हम साथ साथ घर आते । एक बार वह अपने घर भी ले गई । अपनी बूढी मां से मि‍लवाया । उसके घर मे वह और बस बूढा मां । मां को भी बेटी की चिंता रहती थी । माया सुबह 9 बजे नि‍कलती थी । 9.30 बजे सुबह से सांय 5 बजे एक प्राइवेट फर्म में कार्य करती थी और उसके बाद कालि‍ज जाती ।

माया एक सुदर लड़की थी , रंग जैसे दूध में गुलाब की पखुंड़ि‍यों का रस मि‍ला दि‍या हो । ‍हिमाचल की लड़की थी वह । लम्बाई 5.6 इंच के लगभग । तीखे नयन नक्श । इकहरा परंतु सुड़ोल बदन । सफेद सलवार सूट मे एक परी सी लगती थी।

धीरे धीरे घनि‍ष्टता बढती गई । वह अक्सर दि‍न में भी मेरे आफि‍स फोन करती । घर की व पढाई की सब परेशानि‍यां मुझसे ही बताती । हम छुट्टी के दि‍न घंटों झरने के कि‍नारे बैठे रहते । कभी छोटी पहाड़ी पर और कभी देवदार के पेड़ों के नीचे ।

धीरे धीरे एक साल बीत गया । हम दोनों ने पहले साल एम बी ए प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कि‍या ।

एक दि‍न हम सेबों के बाग में बैठे थे । माया मेरे गोद में अपना सि‍र रख कर लेट गई । उसके लम्बे बाल मेरी गोद में बि‍खर गए । उसका सुदंर चेहरा ऐसा लग रहा था मानों काले बादलों के बीच चांद । मेरी हथेली को अपने दोनों हाथो में लेकर माया ने कहा था , मोहन तुम कि‍तने अच्छे हो । तुम न होते तो मैं अकेली रह जाती ''

''माया , तुम भी तो कि‍तनी अच्छी हो'', मैंने भी उससे कहा था ।

''लेकि‍न तुम से कम । इस संसार में व्यक्ति‍ तो बहुत है परंतु अच्छे इन्सान मि‍लना बहुत मुसकि‍ल है''- माया ने मेरी आंखे में आंखे डालकर कहा था । मुझे पता नहीं उस समय क्या हुआ । मैंने माया का माथा चूम लि‍या था।

समय इसी तरह व्यतीत होता रहा और फि‍र दूसरे साल का परीक्षा परि‍णाम आया । परीक्षा परि‍णाम बताने माया मेरे घर आ गई और मुझ से लि‍पट गई । मेरे गालों को चूमती हुई बोली , ''मोहन तुम प्रथम आए हो और मैं द्वि‍तीय । हम दोनों प्रथम श्रेणी में एम बी ए द्वि‍तीय वर्ष पास कर गये । ''

मुझे उसका लि‍पटना अच्छा लगा । साथ ही उसकी गर्म गर्म सांसे जब मेरे चेहरे से टकराई तो एक अजीब सा अहसास हुआ । मन करने लगा जेसे माया को जोर से अपनी बाहों में समा लूं । लेकि‍न तभी दि‍माग ने सोचा - ''नहीं नहीं .. मोहन तुम शादी शुदा हो । तुम्हे़ आगे नहीं बढ़ना चाहिए ।'' और ऐसा सोचते हुए मैंने घडी की ओर ईसारा कि‍या । 9 बज चुके थे । हम ऑफि‍स की ओर नि‍कल पड़े । रास्ते में हम एक मि‍ठाई की दूकान पर रुके । मैंने माया का मुंह मीठा कराया और सांय मि‍लने का वादा करके हम अपने अपने आफि‍स चले गए ।

आफि‍स आकर मैं कार्य करने लगा लेकि‍न मेरा मन माया के ख्यालो में खोया रहा । उसकी बाहों की जकड़न मुझे याद आने लगी । उसके वे रेशमी बाल, सुन्दर मासूम चेहरा और उसकी प्यार भरी चुम्मी - सब एक एक करके फि‍ल्म के पर्दे की तरह मेरी नज़रों के सामने आने लगी । मैं मन ही मन सोचने लगा ,''मोहन यह तुम ठीक नहीं कर रहे हो । तु्म्हारी पत्नी और एक बच्चा है । माया अवि‍वाहिता है । उसको बर्बाद करने का तुम्हें कोई अधि‍कार नहीं ।'' मुझे यह सब सोचते सोचते सि‍र दर्द होने लगा । मैंने कॉफी का आर्डर दि‍या । कॉफी पी । कुछ देर कार्य कि‍या ।

तभी तीन बजे माया का फोन आया , ''आज मैं नही आ पाऊंगी । मुझे देखने वाले आ रहे हैं ।''

अगले दि‍न सुब 6 बजे ही वह मेरे घर आ गई । कहने लगी , ''मोहन मेरी सगाई हो गई । और ऐसा कहकर मुझे अपनी बाहों में भरकर चूमने लगी । मुझे भी जाने क्या हुआ । मैंने भी उसे चुम लि‍या । तभी मेरा दि‍माग काम करने लगा, ''नहीं मोहन, यह सब गलत है । इसकी शादी होने वाली है । इसकी मां तुम पर यकीन करती है । तुम इसको और इसकी मां को ही धोखा नहीं दोगे बल्कि‍ इसके होने वाले पति‍ के खि‍लाफ भी पाप करोगे । रोक लो अपने आपको । यह पाप है । तुम ऐसा कर अपनी पत्नी को भी धोखा दोगे ।'' मैं उसके आगोश से दूर हो गया और रसोई में चाय बनाने चला गया ।

''मोहन कया बात है ? क्या मैं सुंदर नहीं ? मैं तुमसे प्यार करती हूं ''- उसने कुछ देर बाद धीरे से कहां ।

''नही माया नहीं । यह सब पाप है । तुम जानती हो मैं शादी शुदा हूं । यह ठीक नहीं है '', मैंने जवाब दि‍या ।

माया चाय पीती हुई बोलती रही , ''मोहन तुम पढे लि‍खे हो कर दुनि‍या के बनाए हुए नि‍यमों के गुलाम हो गए हो । ये सब नि‍यम समाज के ठेकेदारों ने साधारण व्यक्ति‍यों के लि‍ए घड़े हैं । प्रकृति‍ ने आदमी
और औरत बनाई है । प्रकृति‍ एवं उसकी बनाई चीजों को नकारना अपने आपको धोखा देना है । ये शारीरि‍क जरुरते हैं , समय की मांग है । ये सब प्रकृति‍ की नि‍गाहों में कोई पाप नहीं है । ये पाप-पुण्य की परि‍भाषा हर युग में बदलती रहती है । यह समाज के ठेकेदार अपने फायदे के हिसाब से घड़ते रहते है । क्या तुम उन ठेकेदारों द्वारा बनाए गए नि‍यमों को अपनी ओर मेरी खुशि‍यों से ज्यादा महत्व देते हो ?''

''नहीं माया, मेरी आत्मा गवाही नहीं देती । भगवान सब देखता है । '' मैंने कहा ।

माया बड़ी तार्कि‍क बुद्धि‍ की लङकी थी । कहने लगी , ''क्या अवैज्ञानि‍क बाते करते हो । आदमी चांद पर पहुंच गया और तुम हो कि‍ दकि‍यानुशी बाते करते हो । कोई आत्मा-वात्मा नहीं होती । भगवान भी धर्म के ठेकेदारों द्वारा अपने फायदे के लि‍ए घड़ी गयी चीज है । ये सब साधारण व्यक्ति‍यो के लि‍ए अफ़ीम का कार्य करती है । तुम तो समझदार हो , ऐसी बेवकूफी वाली बाते क्यो करते हो ?''

''नहीं माया, मन को वश में रखना चाहिए । ये इन्द्रि‍या हमेशा धोखा देती है । क्षणि‍क आनंद के लि‍ए अपने को मत गि‍राओ ,'' मैने दार्शि‍नि‍क मुद्रा में कहा ।

माया ने तुरंत जवाब दि‍या , ''कब तक मन और इन्द्रि‍यों से दूर भागोगे । इन इन्द्रि‍यो से ही तो संसार चलता है । ये देखने, सुनने, सुंघने, स्पर्श और स्वाद की अनुभूति‍यां ही तो यह संसार चलाती हैं और हृदय में आनंद का भाव पैदा करती है । हर चीज समय से बंधी है , समय नि‍कलने पर ये सभी भी कुंठि‍त हो जाएगी । समय को मत नकारों । क्या मानव मन पर कोई भी सांसारि‍क नि‍यम प्रति‍बंध लगा सकते हैं ? क्या व्यक्ति‍ की सोच को कोई बांध सकता है ? क्या कि‍सी फूल को देखना, सूघंना या स्पर्श करना पाप है ? क्या कि‍सी फूल को चूमना बुरा है ? क्या कोई फूल आपके ज़ि‍स्म से टकराए और उसके टकराने की आहट कानों को अच्छी लगे तो पाप है ? ये बाग़ के माली के साथ कोई द़गा नहीं । मैं प्रकृति‍ के दि‍ए हुए अनमोल तोहफों - इन्द्रि‍यों को पत्थर नहीं बना सकती । ये हर उस चीज को महसूस करेगी जि‍सको वे देखेंगी, सुनेगी, सुघेंगी, स्पर्श करेगी या उसका स्वाद लेगी । प्यार की अनुभूति‍ सीधे अंतरमन से पनपती है और यह छठी इन्द्री कि‍सी सांसारि‍क बंधन को नहीं मानती। न ही कोई बंधन इसे रोक सकता है । क्या ऐसे बंधन जो व्यक्ति‍ की भावनाओं को रोके, सही है ?''

माया कुछ क्रुर हो गई और क्रोधि‍त सी बोलती रहीं, ''तुमने मेरे साथ सब कुछ कि‍या । मेरे तन को छुआ, मेरी सांसो की गर्मी को महसूस कि‍या, मेरे तन को चूमा, मेरी प्यार भरी बातों को सुना, मेरे सुंदर तन को देखकर आनंद लि‍या , यहां तक कि‍ मेरे मन को छू लि‍या , कौन सी इन्द्री का सदुपयोग नहीं कि‍या ? कि‍न इन्द्रि‍यों को नि‍यंत्रि‍त करने की बातें करते हो ? क्या ये पाप नहीं था ? फि‍र आगे बढ़ने से क्यो घबराते हो ?''

''नहीं माया । दर्शन मत झाड़ों । आगे नहीं । तुम्हें अपने पति‍ के बच्चों की मां बनना है । उसका वि‍श्वास हासि‍ल करना है ।'' मैंने कहा ।

''प्यार करने से दूषि‍त हो जाऊंगी ? क्या नारी को कोई स्वतंत्रता नही ? मर्द कहीं भी, कुछ भी करें सब ठीक है क्यों कि‍ सब सामाजि‍क एवं धार्मि‍क नि‍यम उसी ने बनाए हैं । औरत को तो एक गुलाम बनाकर रखा है । कई ऐसी जनजाति‍यां हैं जो आज भी इस कार्य को बुरा नहीं मानती । फि‍र क्या वि‍श्वास का ठेका आदमी ने ही ले रखा है । नारी की बातों का वि‍श्वास क्यो नहीं ? प्रकृति‍ ने नारी को कोख देकर मानव जाति‍ को एक बहुत बड़ा वरदान दि‍या था लेकि‍न यहीं कोख उसकी दुश्मन बन गई । समाज के ठेकेदारों ने कोख को भी एक अपनी जायदाद बना ली है । इसके लि‍ए स्त्री स्वतंत्रता का गला घोट दि‍या है । नारी की स्वतंत्रता समाज के वि‍कास के लि‍ए जरुरी है । यह समाज का आधा ‍हिस्सा है । क्या उसकी खुशी और उसकी इन्छा का कोई महत्व नहीं ? आज आदमी ने नारी मन पर, उसकी भावनाओं पर, उसके मि‍लने जुलने पर, उसकी इन्द्रि‍यों पर प्रति‍बंध तो हटा लि‍ए पर प्यार को अभी भी बुरा माना जा रहा है । क्यों? क्या उसे अपनी तरह सुखी रहने का अधि‍कार नहीं ? कब तक आदमी नारी को तन से एक नारी ही मानता रहेगा, एक व्यक्ति‍ नहीं? नारी क्या पहले एक व्यक्ति‍ नहीं ? क्या तन से नारी को केवल नारी मानकर और उसे कुछ सामाजि‍क मूल्योँ की दुहाई देकर कैद रखना मानवता का अपमान नहीं है ? आदमी धर्म प्यार, समानता और स्वतंत्रता की बात करता है पर इनकी ऊंचाईयों पर जाने के लि‍ए सामाजि‍क बंधन खड़े करना क्या सहीं हैं ? प्रेम से भागना कोई धार्मि‍क मूल्य नहीं । फि‍र ये मेरा नि‍हायत ही व्यक्ति‍गत मामला है । इसमें मेरा पति‍, बच्चे कहां से आ गए । -उसने लम्बा भाषण झाड़ दि‍या ।

''लेकि‍न समाज के नि‍यमों को तोड़ना एक नैति‍क अपराध है '' –मैंने फि‍र कहा ।

''कि‍स नैति‍कता की बात करते हो ? वो जो तुम्हें मन मारने पर मजबूर करे । वो जो मेरी खुशि‍यों को दर्द में बदला दे । ये मेरा व्यक्ति‍गत मामला है । इसमें समाज कहां से आ गया । समाज मेरे लि‍ए है । ये मौलि‍क स्वतंत्रता व्यक्ति‍गत है जो प्रकृति‍ ने व्यक्ति‍ को दी है । इस पर प्रति‍बंध लगाने वाले नि‍यमों को मानना व्यक्ति‍ के वि‍कास को रोकना है । समाज के नि‍यम व्यक्ति‍ के सम्पूर्ण वि‍कास और उसके हि‍त के लि‍ए होने चाहिए न कि‍ उसके वि‍कास को रोकने या उसके ‍अहित के लि‍ए ।'' माया ने एक चोट खाई नागि‍न की तरह फफकारते हुए कहा ।

मैं उसके गुस्से के आगे कुछ बोल नहीं पा रहा था । लेकि‍न फि‍र भी मेनें कहा -'' माया, मैं तुम्हारी भलाई के लि‍ए ही सोच रहा हूं । मैं तुमसे प्यार करता हूं इसलि‍ए यह; सब नहीं करना चाहता ।''

उसने मुझे बीच में ही टोकते हुए कहा - ''रहने दो मेरी भलाई की बातें । मैं जानती हूं तुम मुझसे कि‍तना प्यार करते हो । ये ढकोसले अपने पास रखो । मैं जा रही हूं । लेकि‍न इतना जरुर कहकर जाती हूं कि‍ तुमने मेरा दि‍ल दुखाया है । तुम अपनी जि‍दंगी में कभी खुश नही रहोगे ''- ऐसा कह कर वह चली गई ।

इसके बाद वह कभी नही मि‍ली । शायद उसकी शादी हो गई और वह अपने पति‍ के साथ कि‍सी अन्य जगह चली गई थी। मेरी भी कुछ महीनेँ बाद सहायक महा प्रबंधक के रुप में पदोन्नति‍ हो गई और मेरा ट्रांसफर चन्नई कर दि‍या गया ।

चन्नई की ब्राचं माऊंट रोड पर थी । काफी बड़ी ब्रांच थी । करोड़ों की अग्रि‍म एवं जमा राशि‍ । स्टाफ भी काफी था । मेरी प्राइवेट सेक्ट्ररी एक तेलुगु लड़की थी । उसका पति‍ हैदराबाद प्रशासन में नौकरी करता था । उसका एक लड़का था जो हैदराबाद के कि‍सी स्कूल में नौवीं क्लास में पढता था । क्योकि‍ चन्नई में वह अकेली रहती थी इसलि‍ए वह देर सांय मेरे साथ आफि‍स में कार्य करती रहती थी । उसका नाम था - छाया । खींचा हुआ बदन, कमर पतली, नयन ‍हिरनी की तरह, चंचल स्वभाव, सांवला बदन, घने काले बाल और चहेरे पर मुस्कराट - ये सब चीेजें कि‍सी के भी मन को आकर्षि‍त करने को बाध्य कर सकती थी । मुझे भी वह अच्छी लगती थी । बहुत हाज़ि‍र जवाब थी वह । कॉफी का इंतजाम करना, डि‍क्टेशन लेना, टाइपिंग करना और हर कार्य समय पर करना उसे खूब आता था , हमेशा ``सर'' कहते हुए मुस्कराकर बात करती थी । बस समस्या थी तो भाषा की । उसे हिंदी बि‍ल्कुल नहीं आती थी । उससे हर बात इंग्लि‍श में ही करनी होती थी । कई बार उसने डि‍नर पर बुलाया । उसका घर साफ सुथरा ओर सजा हुआ था ।

एक दि‍न मैंने इंग्लि‍श में पूछा - ''तुम संडे को क्या कर रही हो ?''

उसने इंग्लि‍श में जवाब दि‍या - ''कोई वि‍शेष कार्य नहीं ।''

''चलो इस संडे को पांडि‍चेरी चलते है ''- मेने कहा ।

उसने कुछ सोचते हुए कहा, ''ठीक है''।

और हम कार में पांडि‍चेरी के लि‍ए रवाना हो गए । मौसम सहुवना था । गाड़ी में ह़िंदी गानों का केसेट बज रहा था । मैंने घर बार की तमाम बातें की । कुछ घंटों बाद पांडि‍चेरी आ गया । हम मां के आश्रम गए । वहा खाना खाया ओर ``बीच'' की ओर नि‍कल पड़े । पांडि‍चेरी के समुद्र का कि‍नारा बहुत ही सकरा लेकि‍न साफ था । मैंने उसे समुद्र में आने के लि‍ए । उसने हाथ बढाया । मैंने उसका हाथ अपने हाथ मे लि‍या और समुद्र के पानी में उतर गए । मुझे अच्छा लगा । समुद्र की उठती लहरें हमें भीगो रही थी । मैंने मजाक मजाक में अपनी अंजुली में पानी भर कर उस पर डाल दि‍या । वह खि‍लखि‍लाकर हंस पड़ी । वह भीग चुकी थी । हम कार में आए । मैंने उसे तौलि‍या दि‍या । वह तौलि‍ये से अपने बाल पोछने लगी । मैं भी अपने हाथ मुंह पोछ कर दूसरे तौलि‍ए से उसके हाथ पोंछने लगा । वह कुछ शर्माई । धीरे से मुस्कराने लगी । मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा - ''छाया, तुम बहुत सुंदर हो । बहुत अच्छी भी हो ।''

यह सुनकर वह मुस्करा दी । उसकी मुसकराट मेरे दि‍ल पर छुर्रि‍यां चला रही थी । हम सांय को वापि‍स चन्नई आ गए ।

धीरे धीरे हमारी घनि‍ष्टता बढती गई । अब मैं अकेले में उसकी तारीफें करने लगा । उसकी सुदरता पर कुछ कवि‍तांए लि‍ख डाली ।

एक सांय मैं उसके घर बैठा उसे अपनी कवि‍ताएं सुना रहा था और वह मंद मंद मुसकरा रही थी । मैंने उससे कहा , ''छाया, तुम्हारी आंखे बहुत सुंदर है । तुम्हारा बदन कमान की तरह खीचा हुआ है । तुम इतनी सुंदर कैसे हो ? ''

उसने धीरे से मुसकराकर बस इतना कहा , ''तुम भी इडली सांबर खाओगे तो सुंदर हो जाओगे ।''

''चलो इस सन्डे गोल्डन-बीच चलते हैं ।''- मैंने सुझाव दि‍या ।

उसने कहाँ - '' ठीक है ।''

और हम कार में सन्डे को गोल्डन बीच की ओर रवाना हो गए । मैं बि‍ल्कुल उसके करीब बैठ गया । उसका शरीर मेरे शरीर से सटा था । मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा -``छाया, तुम न होती तो मेरा इस चन्नई में दि‍ल कैसे लगता।''

वह चुपचाप मुस्कराती रही । मैंने उसके दोनों गालो पर अपने हाथ रखकर उसकी आंखों में झांकते हुए फि‍र कहा - ``छाया तुम दि‍ल में समा गई हो । मैं तुमसे दूर नही रह सकता । तुम्हारी हर चीज मुझको भाती है । तुम्हारी तीखी सी आवाज़ मेरे मन के तारों को झन्ना देती है । मैं क्या करु ?''

वह फि‍र भी मंद मंद मुसकाती रही । मैं उसके प्रेम मे पागल सा हो गया था , मैंने भावुक होकर फि‍र कहा ,'' तुम्हारी सुंदरता मुझपर जुल्म ढा रही है । तुम बहुत सुंदर हो ।''

ऐसा कह कर मैंने उसके होंठो पर अपनी अंगुलि‍या फैरनी चाही । लेकि‍न वह कुछ गम्भीर हो पीछे हट गई । हम बाते करते करते गोल्डन बीच पहुंच गए ।बीच पर हम साथ साथ घूमे । भेलपूरी खाई और चन्नई वापि‍स आ गए ।

मेरा मन उसे अपनी बाहों मे लेने के लि‍ए मचल रहा था । मैं अगली सांय उसके घर गया । मैंने उसे अपनी बाहों में लेना चाहा ।

वह बीच में ही बोली , ''सर बस, इससे आगे नहीं । इससे आगे केवल मेरे पति‍ का अधि‍कार है । मैं सती हूं, अपनी पति‍ की हूं। मैं बाकी कुछ नहीं कर सकती । ''
''लेकि‍न क्यों ? जब मैं तुम्हें देख सकता हूं, छू सकता हूं, बदन की महक ले सकता हूं, तुम्हारी सुंदर आवाज को सुन सकता हूं, तुम्हारे मन में जगह बना सकता हूं तो आगे क्यों नहीं ?'' मैंने एक भूखे व्यक्ति‍ की तरह पूछा जो रोटी होते हुए भी खा नही सकता था ।

''नहीं, यह पाप है । मैं अपने पति‍ को घोखा नहीं दे सकती । मेरा मन भी करता है यह सब करने को । पर मैं बुरी नहीं बनना चाहती । मुझे माफ करो, सर ।'' -उसने कुछ कांपती सी आवाज में कहा ।

मैंने तुरंत कहां , '' लेकि‍न तुम्हारे पति‍ को पता ही नही चलेगा ।''

''नहीं नहीं, मैं अपनी आत्मा और भगवान को धोखा नहीं दे सकती ।'' उसने जवाब दि‍या ।''

``लेकि‍न क्या तुम्हारा पति‍ भी तुम्हारी तरह इतना ईमानदार है ?'' - मैंने कहा ।

``सर, मुझे अपने पति‍ की ईमानदारी से कोई मतलब नहीं । मेरा फ़र्ज है कि‍ मैं उसके साथ ईमानदार रहूं । अपने ईमान की रक्षा करू''- उसने जवाब दि‍या ।

''लेकि‍न छाया...., '' -मैं कुछ कहना ही चाहता था कि‍ वह बोलने लगी -

``सर, ये इन्द्रि‍यों का सुख धोखा है , मन को काबू रखना चा‍हिए । सच्चा आंनद अदंर है - अंतरमन में है । यदि‍ हम इसे साफ रखेंगे तो हमें इन इन्द्रि‍यों से कई गुना ज्यादा सुख मि‍लेगा । सच्चा आनंद भगवान का नाम लेने में है । ये सुख क्षण भंगुर है । इनकी चाहत कभी मि‍टती नहीं । प्यार वासना नहीं है । भोग की तृष्णा कभी शांत नहीं होती । यह सब धोखा है । यह मेरी व्यक्ति‍गत सोच हो सकती है । पर यहीं मुझे खुशी और आनन्दि‍त रखती है ।क्या आप चाहेगें कि‍ आप मेरे दि‍ल को दु:खाए ? आप अच्छे इन्सान है । अच्छे ही बनकर रहे ।''

छाया की बातें सुनकर मेरा प्यार का बुखार उतर गया । मैं अपने घर आ गया । अगले दि‍न आफि‍स में जाकर मैंने अपना दि‍ल्ली स्थानांतरण के लि‍ए प्रार्थना पत्र मुख्य कार्यालय को भि‍जवा दि‍या । कुछ ही दि‍नों में मेरा ट्रांसफर दि‍ल्ली हो गया । उसके बाद मैं छाया से कभी नहीं मि‍ल पाया ।
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आदमी की औकात-ड़ा प्रमोद कुमार

आदमी  की औकात-ड़ा प्रमोद कुमार

एक बेरवाला सड़क के फुटपाथ पर अपना बेरों से भरा टोकरा लि‍ए बैठा था । लोग आते, दाम पूछते और चले जाते थे । कोई भी व्यक्ति‍ बेर खरीदने के लि‍ए रूक नहीं रहा था क्योंकि‍ इस साल बेर कुछ मँहगें थे।

तभी एक व्यक्ति‍ आया । उसने घोती-कुर्ता पहना था । कपड़े भी कुछ मैले से थे । शायद कि‍सी गाँव से आया था । उसने बेरवाले से पूछा, ``भाई बेर क्या भाव हैं ?''

बेर वाले ने उसकी ओर देखते हुए जवाब दि‍या ``जाओं भई, आगे जाओं । सुबह-सुबह बोहनी के वक्त दि‍मा$ा खराब मत करो ।''

गाँव के आदमी ने प्यार से कहाँ, ``मैंने बेर का भाव पूछा है । तुम्हें कोई गाली तो दी नहीं । इसमें दि‍माग खराब करने की क्या बात है ?''

बेरवाले ने कहाँ, ``बेर 20 रूपये कि‍लों हैं । क्या तुम ले पाओगे ?''

तभी एक कार वहाँ आकर रूकी और उसमें से कोट-पैंट पहने एक सफेद पोस आदमी उतरा । उसने बेर वाले से भाव पूछा । बेर वाला तुरन्त, गाँव वाले व्यक्ति‍ को छोड़ कार वाले को बताने लगा, ``साब बेर बीस रूपये कि‍लों हैं । कि‍तने दडँ ?''

गाँव वाले व्यक्ति‍ ने बीच में ही बोला, ``बेर वाले ! पहले मैं आया था । पहले मुझे नि‍बटा दो ।''

लेकि‍न बेर वाले ने उसकी बात अनसूनी कर दी । शायद बेर वाला यह सोच रहा था कि‍ इस गाँव के गँवार के पास इतने पैसे ही नही होंगें जो बेर खरीद सके । यदि‍ खरीदेगा भी तो 100-150 ग्राम से ज्यादा नही । वह कार वाले से फि‍र पूछने लगा, ``साहब दो कि‍लो तोल दडँ ।''

गाँव वाले व्यक्ति‍ ने बेर वाले से फि‍र कहाँ, ``बेर वाले ! बेर पहले मुझे दो । मैं इन साहब से पहले आया था ।''

गाँव वाले की बातें सुनकर कार वाले साहब भी चि‍ड़ गया । शायद वह अपनी बेइज्ज़ती महसूस कर रहा था । उसने गाँव वाले व्यक्ति‍ से गुस्से से कहाँ, ``ये ग्ॉवार ! तुम अपनी औकात सें रहो । मैं इसके सारे बेर खरीद सकता हूँ । तुम जैसे कंगालों के पास एक कि‍लों बेर खरीदने तक के पैसे होते नहीं और चले आते है मुझ जैसे रहीश़्ा से टकराने । जाओ दफ़़ा हो जाओं । मुझे बेर लेने दो ।''

गावँ वाले व्यक्ति‍ को गुस्सा आ गया । लेकि‍न अपने गुस्से को काबू रख कर बोला, ``साहब इसमें कि‍सी के अमीर या गरीब होने का प्रश्न नहीं है बल्कि‍ सवाल सि‍द्वान्त का है । क्योंकि‍ पहले मैंआया था इसलि‍ए बेर वाले को बेर पहले मुझे ही तोलने चाहि‍ए ।''


कार वाले साहब और ज्यादा गुस्से मे बोले, ``ए भि‍खारी !तुम अपनी बराबरी मुझसे करते हो । मैं तुम्हारे जैसे दस गँवार खरीद कर अपने घर नौकर रख सकता हूँ । तुम्हारे पास कि‍तने पैसे हैं । 20, 50 या ज्यादा से ज्यादा सौ रूपये । तुम्हारे पास मेरे से ज्यादा पैसे नहीं हो सकते । एक रहीश़्ा से टकराते हो । कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली ।''

``साहब पैसे से आदमी बड़ा नही बनता । इन्सानि‍यत एवं अच्छे व्यवहार मे बड़प्पन पलता है ।'' गाँव वाले ने उत्तर दि‍या ।

कार वाला तुरंत बोला, ``अरे, पैसा से सब खरीदा जा सकता है । पैसा है तो सब कुछ है ।''

``साहब पैसा सब कुछ नहीं होता और न ही पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है । खैर, यदि‍ आप पैसे से ही औकात नापते हो तो देख लेते हैं कि‍स की जेब में ज्यादा पैसा है । आप भी अपनी जेब से सारे पैसे नि‍काल लि‍जि‍ए, मैं भी अपने सारे पैसे नि‍काल लेता हूँ । जि‍सकी जेब से पैसे ज्यादा नि‍कालेगें वही बेर पहले खरीदेगा ।'' - गाँव वाल ने साहब से शर्त लगाते हुए कहाँ ।

साहब बहुत खुश हुआ । उसको पता था कि‍ उसकी जेब में लगभग 8000 रूपये हैं । साहब ने गाँव वाले की शर्त तुरंत मान ली । साहब ने अपनी जेब से पर्स नि‍काला और पैसे गि‍नकर कहने लगा, ``देख गवॉर; मेरे पास 8690 रूपये हैं । गि‍नकर देख लो ।''

``बस मात्र 8690 रूपये । अब तुम देखों । अरे, बेर वाले गि‍नते रहना ।'' ऐसा कहकर गाँव वाला पैसे नि‍कालने लगा । पहले उसने ऊपर वाली जेब से 540 रूपये नि‍काले । फि‍र धोती के पल्लू से 5000 रूपये नि‍काले । उसके बाद उसने अपनी बनि‍यान की जेब से 10,000 रूपये नि‍कालकर बेर वाले को गि‍नने के लि‍ए दे दि‍ए । ये सब रूपये उसे अपनी भैंस बेचने के बदले मि‍ले थे ।गाँव वाले ने बेर वाले से पूछा, ``कि‍तने हुए ।''

बेर वाले ने कहाँ ``15540 र€पये ।''

गाँव वाले ने कहाँ, ``और भी है, नि‍कालू ?''

कार वाला शर्त हार चुका था । वह अपना सा मुहँ लेकर रह गया ।

``साहब, कभी पैसे का घमंड़ मत करना । पैसा आता है, जाता है । यह कि‍सी का नही । अपने हैं तो अपने कर्म; अपना व्यवहार । आदमी की औकात उसके कपड़ों से कभी नहीं आकँनी चाहि‍ए । उसकी औकात उसकी इन्सानि‍यत में है जो उसके व्यवहार एवं कर्मों से छलकती है । जाओ साहब तुम ही बेर पहले ले लो । मैं तो केवल आपको इन्सानि‍यत का एक सबक सि‍खाना चाहता था।''- ऐसा कहकर गाँव वाला चुपचाप चला गया ।


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Thursday, September 10, 2009

एक और स्वतंत्रता संग्राम- डा. प्रमोद कुमार

एक और स्वतंत्रता संग्राम-डा. प्रमोद कुमार

प्रथम श्रेणी का वातानुकूलि‍त कम्पार्टमेंट सचमुच ही बहुत आरामदेह होता है । मई महीने में भी मुझे नवम्बर की ठंड़ का अहसास हो रहा था । खि‍ड़कि‍यों पर चमचमाती धूप से सफेद पर्दे कम्पार्टमेंट के वातावरण को और भी रूमानी बना रहे थे । कम्पार्टमेंट की सामने वाली दीवार पर एक "सीनरी" लगी थी जि‍समें हरे-भरे पेड़-पौधे और खि‍ले हुए रंग-बि‍रंगे फूलों का लुभावना दृष्य था । पेड़ के नीचे एक सुन्दर मोर अपने पंख फैला कर नाच रहा था । एक बच्चा उसे देखकर हँसता हुआ दि‍ख रहा था । सचमुच ही दृश्य बहुत सुन्दर लग रहा था ।

मैं बहुत खुश था । कम्पनी ने मुझे पदोन्नत करके लखनऊ कार्यालय का महा प्रबन्धक नि‍युक्त कि‍या था । लखनउ€ मेल के इस वातानुकूलि‍त डि‍ब्बे में बैठा मैं अपने भवि‍ष्य के बारे में सोचने लगा -"लखनऊ में कम्पनी का दि‍या आलीशान मकान होगा, कार होगी, नौकर-चाकर होंगे । तनख्वाह में 5000 रूपये मासि‍क की वृद्धि‍ होगी । कम्पनी की उत्तर प्रदेश की सारी शाखाएँ मेरे आदेश पर कार्य करेंगी ।" मैं यह सब सोचकर बहुत ही रोमांचि‍त हो रहा था ।

मेरी बर्थ नीचे वाली थी । मैंने खि‍ड़की का पर्दा हटाया और बाहर देखने लगा । अनायास मेरी नज़़र एक बच्चे पर पड़ी जो प्लेटफार्म पर यात्रि‍यों द्वारा फेंके गये पत्तों से जूठन इकट्ठी कर रहा था । यह देखकर मुझे अपनी गरीबी और संघर्ष की याद आ गई जि‍सके आईने में मेरा अतीत झलकने लगा ।

गाँव का एक कच्चा मकान, जि‍समें मैं अपनी बूढ़ी माँ और बड़े भाई के साथ रहता था । बापू बचपन में ही मर गए थे । तब मैं 15 साल का था । बापू चाहते थे कि‍ मैं पढ़-लि‍खकर एक दि‍न बड़ा आदमी बनूं, इसलि‍ए वह मुझे कुछ काम करने नही़ देते थे । वे खुद देर तक भट्ठी पर कार्य करते । मैं जब भी कहता - "बापू आराम कर लो", बापू और तेजी से काम में जुट जाते । वे कहते, "बेटे! तुझे बड़ा आदमी बनाना है । खूब पढा़ना है, शहर भेजना है । इस सबके लि‍ए पैसे चाहि‍ए न ! मुझे काम करने दे।" ऐसा कहते हुए वे भट्ठी से गर्म लोहा नि‍कालकर उसे हथौड़े से पीटने लग जाते ।

सचमुच लोहार की जि‍न्दगी बड़़ी कठोर होती है । सारे दि‍न काम करने पर भी वे एक दि‍न में पाँच-सात दराति‍याँ ही बना पाते । कभी-कभी दो-चार चि‍मटे ज्यादा बना लेते लेकि‍न इन सब की कीमत 30-35 रूपये से ज्यादा थोड़े ही होती थी । बड़ा भाई और माँ भी बापू के काम में हाथ बटाते । भाई धौकनी फुला-फुला कर भट्ठी को लाल करता और माँ ठोक-पीटकर दराति‍यों और चि‍मटों को बेचने लायक बनाती । दराति‍यों पर लकड़ी के हत्थे लगाती, चि‍मटों को मोड़कर बराबर करती । हर सोमवार पास के एक गाँव में हाट लगता था, जहाँ बापू बना माल बेचने जाते थे । और यही करते-करते एक दि‍न बापू मर गए ।

माँ और बड़े भाई ने मेहनत कर-कर के मुझे पढ़ाने के लि‍ए शहर भेजा । मैं वहाँ हॉस्टल में रहकर पढ़़ने लगा। माँ पेट काटकर पैसा बचाती और मुझे भेजती । मैंने बी.ए. पास कर लि‍या । धीरे-धीरे मेरा एम.बी.ए. भी पूरा हो गया और इसी कम्पनी में मुझे "मैनेजमेंट ट्रेनी" की नौकरी मि‍ल गयी । फि‍र मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा । मैं आकाश छू लेना चाहता था । शहर में रहकर कम्पनी के कामों में जुटा रहता । मैंने कभी अच्छे-बुरे का ध्यान नहीं कि‍या और जो सीढ़ी ऊँचाई की ओर जाती, उसी पर चढ़ता गया । बस ध्यान रखा तो इस बात का कि‍ मै ऊँचे से ऊँचे पद पर पहुँचू । यही कारण है कि‍ मैं 35 साल की छोटी सी उम्र में इस कम्पनी का महाप्रबंधक बन गया । सच, इस महाप्रबंधकी तक पहँुचने में मैंने अपनी बूढ़ी माँ के बारे में कभी नहीं सोचा, जो एक-एक पैसा जोड़ कर हर महि‍ने मुझे मनीआर्डर भेजा करती थी ।

गाड़ी चलने में पाँच मि‍नट शेष थे । तभी कम्पार्टमेंट में एक वृद्ध व्यक्ति‍ दाखि‍ल हुआ और मेरे पास वाली सीट पर बैठ गया । मैं उसे घृणा की दृष्टि‍ से देखने लगा । वृद्ध की उम्र लगभग 75-80 साल की होगी । उसके हाथ में एक पुराना छाता था । बाल पूरे पके हुए, पर चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी । उसने पुराना सा कुर्ता-पाज़ामा पहना हुआ था । उसके शरीर से पसीने की गंध आ रही थी । मुझे उसका पास बैठना बि‍ल्कुल अच्छा नहीं लगा ।

मैंने गुस्से में कहा, "ए ! तुम कहाँ घुस आये हो ? जानते नहीं कि‍ ये ए.सी. कम्पार्टमेंट है ? उधर कहीं दूसरे डि‍ब्बे में जा कर बैठो ।"

तभी अन्य एक यात्री जो मेरी बगल वाली बर्थ पर बैठा था चि‍ल्लाते हुए बोला, "सुना नहीं तुमने, इस डि‍ब्बे से नीचे उतरो । इस डि‍ब्बे में बैठने के लि‍ए ए.सी. का टि‍कट चाहि‍ए ।"

लेकि‍न वह वृद्ध चुपचाप बैठा रहा । गाड़ी चलने लगी ।

तभी कन्डक्टर आया । मैंने उससे तुरन्त कहा - "देखि‍ए कन्डक्टर साहब, एक गंवार मेरे पास वाली सीट पर बैठ गया है । कृपा करके इस भि‍खारी को डि‍ब्बे से बाहर नि‍कालि‍ए । इसने सारे डि‍ब्बे के वातावरण को दूषि‍त कर दि‍या है । ऐसे व्यक्ति‍ भी यदि‍ वातानुकुलि‍त श्रेणी में चलने लगेंगे तो भले लोग कहाँ जायेंगे ?"

कन्डक्टर ने वृद्ध को नफ़रत की नि‍गाह से देखते हुए कहा- "टि‍कट दि‍खाओ।" वृद्ध ने पुराने कपड़े के थैले से एक पुरानी डायरी नि‍कालकर उसमें से एक छोटी सी पास बुक नि‍कालकर दी, जि‍समें उसका फोटो लगा था । यह एक "फ्री-कार्ड पास" था जो इस देश के चुनिंदे स्वतंत्रता-सेनानि‍यों को दि‍या जाता है ।

कन्डक्टर ने उसे गौर से देखते हुए कहा,"लेकि‍न तुमने कोई आरक्षण तो करवाया नहीं।"

वृद्ध ने बहुत सम्मानजनक तरीके से जवाब दि‍या, "कन्डक्टर साहब, मेरा आज अलीगढ़ पहुँचना बहुत जरूरी है। समय की कमी के कारण मैं आरक्षण नहीं करवा पाया।"

कन्डक्टर ने रोब झाड़ते हुए कहा, "माफ करो, इस डि‍ब्बे में जगह नहीं है । तुम कि‍सी द्वि‍तीय श्रेणी के कम्पार्टमेंट में चले जाओ ।"

वृद्ध ने वि‍नम्रतापूर्वक कन्डक्टर से नि‍वेदन कि‍या "साहब, इस डि‍ब्बे में कुछ सीटें खाली हैं। यह "पास" भी वातानुकूलि‍त श्रेणी में मान्य है। यदि‍ आप एक सीट मुझे नहीं दे सकते तो मैं कि‍सी दूसरे डि‍ब्बे में चला जाता हूँ इतना कहकर वह चुपचाप डि‍ब्बे से बाहर जाने लगा ।

तभी मेरे सामने वाली सीट पर बैठा एक व्यक्ति‍, जो बड़ी देर से हमारी बातें सुन रहे था बोला "आप सब लोग इस बुजुर्ग के साथ इतना अभद्र व्यवहार क्यों कर रहे है ? इस सज्जन व्यक्ति‍ ने नम्रता के साथ नि‍वेदन कि‍या है कि‍ वह कि‍सी कारणवश पहले आरक्षण नहीं करा सके और उनका आज अलीगढ़ पहुँचना बहुत जरुरी है । यहीं नहीं इनके पास "कार्ड पास" भी है जो भारत सरकार ने कुछ गि‍ने-चुने इज्ज़़तदार व्यक्ति‍यों को ही दि‍ये हैं जि‍न्होंने इस देश की आजादी के लि‍ए अपना अमूल्य योगदान दि‍या था ।"

व्यक्ति‍ ने वृद्ध को रोकते हुए कहा, "आप इधर ही बैठ जाइये। यहाँ कोई नहीं बैठा है ।"

वृद्ध उस व्यक्ति‍ के पास वाली सीट पर बैठ गया । उस व्यक्ति‍ ने कन्डक्टर से गुस्से में कहा, "मि‍स्टर कन्डक्टर ! आप क्या ख़ाक कंडक्टर है ? आपको यात्रि‍यों से अच्छी तरह "कन्डक्ट" करना भी नहीं आता । आपने अभी दो मि‍नट पहले 34 नम्बर बर्थ एक यात्री को 150 रूपये लेकर दी है । क्या उसके पास आरक्षण था ? उसके पास तो ए.सी. टि‍कट भी नहीं था, फि‍र भी आपने उसका टि‍कट ए.सी. का बनाया और उसे आरक्षण दि‍या । अरे! आपको तो शर्म आनी चाहि‍ए । देखि‍ए, यह सीट अभी खाली है यदि‍ इस सीट का कोई दावेदार आएगा तो इन्हें मैं अपनी सीट दे दूंगा । और हाँ, कृपया भवि‍ष्य में बुजुर्गों से सज्जनता से पेश आये।"

उस व्यक्ति‍ की बातें सुनकर कन्डक्टर आगे चला गया । मैं भी झेंप गया और चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गया ।

गाड़़ी तेज़ रफ्तार से दौड़ी जा रही थी । वृद्ध सामने वाली व्यक्ति‍ से बातें कर रहा था । वार्तालाप गाड़ी के शोर के कारण कुछ-कुछ सुनाई पड़ रहा था । उनकी बातों से पता चला कि‍ उस व्यक्ति‍ का नाम वीर सिंह है । सेना में एक कर्नल हैं वह, और जि‍स वृद्ध से वह बातें कर रहा है उनका नाम इरफ़ान महमूद है ।

तभी वीर सिंह ने वृद्ध से कहा, "दादा जी, आपने तो स्वतंत्रता संग्राम में भाग लि‍या था । कुछ उस समय की बातें सुनाइये, मुझे अच्छी लगेंगी ।"

वृद्ध कुछ सोचने लगे । गम्भीरता की कुछ लकीरें उनके माथे पर उभर आई । वह भावपूर्ण मुद्रा में बोले- "बेटे, क्या बताऊँ । उस समय का माहोल ही कुछ और था । व्यक्ति‍ अपने बारे में कम और देश के बारे में ज्यादा सोचता था । मैं एक क्रान्ति‍कारी था । 1942 के आन्दोलन में मुझे जेल भेजा गया । तरह-तरह की यातनाएं दी गई, लेकि‍न दि‍ल में वतन के लि‍ए मर-मि‍टने का ज़ज्बा था । कठोर से कठोर यातनायें हमने झेली । देश आजाद हुआ । हम जेल से रि‍हा कर दि‍ये गए । मैं अलीगढ़ में रहने लगा । मैंने शादी नहीं की, लेकि‍न अब अलीगढ़ में एक अनाथालय का संचालन कर रहा हूँ । मैंने वृद्धों के लि‍ए एक आश्रम भी खोला हुआ है । देशवासि‍यों की सेवा करते-करते, समय व्यतीत हो रहा है ।

इरफ़ान मि‍याँ आगे बोलते रहे, "आज लोग धर्म, जाति‍ और प्रदेश की बातें करते हैं । एक दूसरे से लड़ते हैं । जोड़ने के बजाय देश को तोड़ने में लगे हैं । हमने अपने तुच्छ स्वार्थों को कभी अहमि‍यत नहीं दी । उस समय यह सब कुछ नहीं था ।"

कर्नल वीर सिंह ने बीच में टोकते हुए कहा, "दादा जी! आप सही कहते है । जब ये लोग आपको डि‍ब्बे से नीचे उतरने को कह रहे थे तो मुझे महात्मा गाँधी जी के जीवन की वह घटना याद आ रही थी, जब उन्हें दक्षि‍ण अफ्रीका में एक अंग्रेज ने प्रथम श्रेणी के डि‍ब्बे से इसलि‍ए बाहर नि‍काल दि‍या था क्योंकि‍ वे काले थे । लेकि‍न आज मुझे यह देखकर गुस्सा नहीं, शर्म महसूस हो रही थी कि‍ इस आजाद देश में लोग उस इन्सान को डि‍ब्बे से बाहर नि‍काल रहे है, जि‍सने इस देश को आजाद कराने में अपना सर्वस्व समर्पि‍त कर दि‍या । अंग्रेजों का भारतीयों के लि‍ए खि‍लाफ दुर्व्यवहार तो सुना था, लेकि‍न एक स्वतंत्रता सेनानी को बेइज्ज़त करके डि‍ब्बे से बाहर नि‍कालना और वह भी उस देश के नागरि‍कों द्वारा जि‍नके लि‍ए उसने अपनी जवानी जेल में बि‍तायी हो, सचमुच ही यह बहुत शर्मनाक है । जि‍स स्वतंत्रता के वृक्ष को सेनानि‍यों ने अपने खून से सींचा, क्या उसका फल चखने का भी अधि‍कार उनको नहीं है ?"

मैं अपनी सीट पर बैठा उनका वार्तालाप सुन रहा था । मुझे वृद्ध के प्रति‍ कि‍ए गए अपने व्यवहार पर पछतावा हो रहा था ।

तभी डि‍ब्बे में चाय वाला आया । गाड़ी कि‍सी स्टेशन पर रुकी थी । वीर सिंह ने तीन कप चाय ली । एक वृद्ध को दी, एक कप मुझे देते हुए ख़ुद अपने कप से चाय पीने लगे । मैं संकोच करते हुए चाय पीने लगा । गाड़ी फि‍र चलने लगी ।

वीर सिंह ने बात आगे बढ़ाई- "दादा जी! जानते है, मेरे नानाजी भी स्वतंत्रता सेनानी थे । उन्हें सरकार ने देश सेवा के लि‍ये ताम्र-पत्र दि‍या था । वे भी पाँच साल लाहौर जेल में रहे थे । वे अब इस दुनि‍या में नहीं है ।"

इरफ़ान मि‍याँ ने उत्सुकता से पूछा- "क्या नाम था उनका?"

वीर सिंह ने बताया- "श्री जयसिंह।"

इरफ़ान मि‍याँ के चेहरे पर स्मृति‍ की एक लहर दौड़ गई । वे तुरंत बोले, "अरे ! तुम जयसिंह के पोते हो । उन्हें तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ। लाहौर जेल में हम साथ-साथ थे । मुझे आज भी याद है वे दि‍न जब मैं जेल तोड़ कर भागा था । इस कोशि‍श में मुझे जेलर ने पक़ड़ लि‍या था और बहुत मारा था । जेलर की बेतों की मार से मैं लहू-लुहान हो गया था । उस समय जयसिंह ने ही मेरी मरहम-पट्टी की थी । वे सचमुच भले इन्सान थे । पंजाब केसरी लाला लाजपत राय के साथ हमने हँसते-हँसते लाठि‍याँ खाई थी । वतन के लि‍ए जीने और मरने का भी क्या नशा होता है । न हमें भूख की चि‍न्ता थी, न आन की फि‍क्र । बस एक ही लक्ष्य था - देश की आजादी । त्याग का ज़ज्बा रग-रग में समाया हुआ था । सच्चाई और ईमानदारी की भावना मन में बसी थी । एक दूसरे पर वि‍श्वास था । देश के प्रति‍ प्रेम का अर्थ लोग समझते थे । लेकि‍न आज सब कुछ बदल चुका है । व्यक्ति‍ खुद में ही सि‍मटकर रह गया है । देश को अपने तुच्छ स्वार्थ पूर्ति‍ के लि‍ए बेच रहा है । पि‍छले कुछ सालों में मैंने आदमी की गि‍रावट का वह मंज़़र देखा है, जो शायद मैं अंग्रजी राज में नही़ं देख पाया था ।"

इरफ़ान मि‍याँं के चेहरे पर अवसाद के भाव थे । वे चुप नहीं हुए और फि‍र बोलने लगे, "आज का आदमी अपनी स्वार्थपूर्ति‍ के लि‍ए इस कदर गि‍र गया है कि‍ वह उन्हीं लोगों का अहि‍त करने लगा है जो उसकी सफलता में कभी सहायक बने थे । जि‍न्होंने उसे आगे बढ़ने में सहयोग कि‍या था । आज का आदमी प्यार, वि‍श्वास, क्षमा, सच्चाई, उपकार, आदर - इन शब्दों का अर्थ नहीं समझता। यहाँ तक कि‍ वह प्यार के बदले में आघात करता है । क्षमा करो तो दुर्बल समझता है । वि‍श्वास करो तो धोखा देता है । उसको सच कहो तो नाराज़ होता है । उस पर उपकार करो तो नकारता है, और यदि‍ आदर करो तो ख़ुशामद समझता है । आज का व्यक्ति‍ इन्सानि‍यत नहीं जानता। व्यक्ति‍ के महत्व उसके कपड़े धन व पद से करता है, उसकी शालीनता, ईमानदारी और परि‍श्रम से नहीं ।"

वीर सिंह ने बीच में ही कहा, "दादा जी, आप सही कहते हैं । आज का व्यक्ति‍ उच्च पद इसलि‍ए प्राप्त करना चाहता है ताकि‍ वह समाज एवं व्यवस्था को अपने फायदे के लि‍ए प्रयोग कर सके । पहले ओहदे का मतलब जि‍म्मेदारि‍याँ होती थी ।आज ओहदे का मतलब शक्ति‍ है आज व्यक्ति‍ का बडप्पन उसके पैसे से परखा जाता है ।"

इरफ़ान मि‍याँ ने चि‍न्ति‍त भाव से कहा, "बेटे ! हम अंग्रेजों से लड़े क्योंकि‍ वे वि‍देशी थे और देश को गुलाम बनाकर बर्बाद कर रहे थे । हम अपनी लड़ाई में सफल भी हुए । लेकि‍न आज अपने ही लोग घर को बर्बाद कर रहे हैं । मुझमें अपने ही लोगों से लड़ने की हि‍म्मत नहीं है । मैं तो अब बहुत वृद्ध भी हो चुका हूँ । हमें यदि‍ पता होता कि‍ हमारे ही घर के लोग इस घर को आग लगायेंगे तो देश को स्वतंत्र कराने के लि‍ए कभी नहीं लड़ते । आज के आदमी का न तो देश प्रेम से कोई वास्ता है और न ही इन्सानि‍यत से।"

इरफ़ान मि‍याँ बोलते रहे, "बेटा ! आज एक और स्वतंत्रता संग्राम लड़ने की जरूरत है जो वि‍देशि‍यों से नहीं, बल्कि‍ उन बुराइयों के खि‍लाफ हो जो देश की प्रगति‍ में बाधक हैं । बेईमानी, नफ़रत, झूठ, घृणा, गरीबी, धोखा,अपकार, आदेि‍ बुराईयाँ सारे देश में घर कर गई हैं । इनके रहते हम देश प्रेम, त्याग, नैति‍कता, इन्सानि‍यत, ईमानदारी जैसे मूल्यों को नहीं पनपा पाएंगे, और न ही इस देश को तरक्की की राह पर ले जा सकेंगे ।"

गाड़ी रूक रही थी । शायद अलीगढ़ आ गया था । वृद्ध इरफ़ान मि‍याँ उतरते हुए मुझसे बोले, "माफ करना साहि‍ब मेरे यहां बैठने से आपको जो तकलीफ हुई, उसके लि‍ए मैं क्षमा चाहता हूँ ।" - ऐसा कहकर उन्होंने वीर सिंह से ख़ुदा हाफ़ि‍ज कहते हुए अपना छाता बगल में दबाया और अपना पुराना सा थैला हाथ में ले गाड़ी से उतर गए ।

डि‍ब्बे में बि‍ल्कुल शान्ति‍ छा गई, लेकि‍न मेरे मन में एक तूफान उठ रहा था । मैं अपने आपको बहुत तुच्छ महसूस कर रहा था । मुझमें अपने महाप्रबंधक बनने का घमंड चूर हो गया था । वह वृद्ध मुझे हि‍मालय से भी ऊँंचा लग रहा था । अपनी जवानी कुर्बान करके वह इस वृद्धावस्था में भी अनाथों व वृद्धों की सेवा कर रहा था । वृद्ध की कही बातों ने मुझे हि‍लाकर रख दि‍या ।

गाड़ी तेज रफ्तार से चल रही थी । मेरी नि‍गाहें फि‍र खि‍ड़की के पर्दों पर पड़ी । वे अब मुझे धुले नहीं लग रहे थे । मैंने सामने "सीनरी" को देखा । "सीनरी" के हर पेड़ मुझे ठूॅठ लग रहा था । पेङों के पास सब मुरझायें हुए फूल थे । मोर चुपचाप खड़ा रो रहा था । उसके पंख बन्द थे । "सीनरी" के दृश्य वाला बच्चा भी अब हंस नहीं रहा था बल्कि‍ वह जूठी पत्तलों के बीच खाना ढूंढ़ रहा था ।

मुझे अपनी बूढ़ी माँ याद आ रही थी । नैति‍कता और दायि‍त्व का एक और स्वतंत्रता संग्राम मेरे मन में हि‍लोरे ले रहा था ।

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