Tuesday, October 6, 2009

कच्चा मकान-डा. प्रमोद कुमार

कच्चा मकान-ड़ा प्रमोद कुमार

आज ही मुझे एक पत्र मि‍ला । बालू रेत के कण उसमें चि‍पके थे । जैसे ही पत्र पढ़ने लगा तो मुझे लगा कि‍ वह कच्चा मकान जि‍सकी दीवारों से सटकर हम कभी एक साथ बैठे थे, बाते की थी, एक तेज तूफान के कारण बालू से ढक गया हो और मैं एक टीले पर बैठा यह नजारा देख रहा हूं । यह पत्र रेश्मा का था जो जैसलमेर से आया था । पत्र पढ़कर मैं उसका जबाब लि‍खने लगा ।

``प्रि‍य रेश्मा,

तुम्हारा पत्र पढ़कर पुरानी यादें ताज़ा हो गयी। मुझे आज भी याद है पि‍छले महीने की वह दो तारीख जब मैं तुम्हें देखने जैसलमेर गया था । तभी तुमने उस कच्चे मकान के बारे में बताया था जो कभी-कभी गर्मि‍यों में तुफानी हवाओं के कारण बालू रेत में समा जाता था और वहां एक टीला बन जाता था। मैं उस मकान को टीला बनते अपनी आंखो से देख तो नही पाया लेकि‍न आज मुझे चंदीगढ़ वि‍श्ववि‍द्यालय के होस्टल के कमरा नंबर 7 से वह दृश्य साफ-साफ दि‍खलायी पड़ रहा है । मुझे वह मकान बालू रेत में समाते हुए साफ-साफ नज़र आ रहा है ।

जानती हो, मैने कभी सोचा था कि‍ हम शादी के बाद उसी कच्चे मकान में रहेंगे और अपने प्यार से इसे संवारेंगे । प्यार की सीमेन्ट से इसकी दीवारों पर लेप करके इसे पक्का बनाएंगे । जहां हम हो और हो बस हमारा प्यार । और कोई न हो । वो सपनों का मकान आज बालु में समा गया ।

तुमने पत्र में डा. रमेश के बारे में लि‍खा जो तुम्हारे गांव का ही है । तुम उससे बहुत प्यार करती हो पर वह तीन साल पहले तुम्हें कि‍शोरी से युवती बना कर कनाडा चला गया और तुम अभी भी उसको चाहती हो । काश यह बात तुमने दो तारीख को बता दी होती जब मैं तुम्हें जैसलमेर में मि‍ला था । मैं सपने तो न देखता । मुझे अब भी याद है वो दो तारीख । कि‍तने आदर से तुमने मेरा स्वागत कि‍या था । कि‍तने प्यार से मुझे जैसलमेर का कि‍ला दि‍खाया था और सायं को कच्चे मकान की दीवारों की छावँ में बैठकर बाते की थी । वो टीलों पर घुमाना मुझे आज भी याद है । बालू रेत की ठंडी-ठंडी हवाएँ और रेत के टीलो पर तुम्हारे साथ हाथ में हाथ ले चलना मुझे आज भी याद है । तुम्हारे शेखावाटी तीखे नयन-नक्स मुझे बहुत आकर्षि‍त करते थे और तुम्हारे पि‍ता श्री रणसिंह सेखावतजी तो दि‍ल से चाहते थे कि‍ तेरी और मेरी शादी हो जाये ।

रेश्मा, तुमने रमेश के बारे में पहले न बतला कर अच्छा नहीं कि‍या । मैंने तुम्हें प्यार की नि‍गाह से देखा था और दि‍ल से चाहा था । क्या तुमने अपने माता-पि‍ता को रमेश के बारे में बताया ? यदि‍ नहीं तो तुरन्त बता दो जि‍ससे की वे रमेश के मां-बाप से मि‍लकर तुम्हारी रमेश से शादी की बात कर सकें । यदि‍ तुम उसे चाहती हो तो तुरन्त बता दो । तुमने लि‍खा है कि‍ रमेश ना तो कनाडा से वापस आना चाहता है और न ही तुम्हें वहां बुलाना चाहता है । लेकि‍न क्यों? क्या वह तुम्हें प्यार नहीं करता ?

तुमने पत्र मे आगे लि‍खा है कि‍ मुझे रमेश के बारे में जानकर बुरा तो नही लग रहा है । रेश्मा ! मैं बुरा तो नहीं मान रहा लेकि‍न हां अच्छा नहीं लग रहा क्योंकि‍ तुमने ये सब बाते मुझे उस समय नहीं बतायी । तुम लि‍खती हो कि‍ तुमने अपनी इज्जत छुपाने एवं मां-बाप को परेशानीे से बचाने के लि‍ए जैसलमेर में उस दि‍न ये सब बातें मुझे नहीं बतायीं ।

रेश्मा, कोई बात व्यक्ति‍ हमेशा के लि‍ए नहीं छुपा सकता । इश्क छुपाने से नहीं छुपता । व्यक्ति‍ अपने आप से कोई बात छुपा ही नहीं सकता । वक्त कभी न कभी हर बात कह देता है और यदि‍ वह नहीं कहता तो व्यक्ति‍ का व्यवहार एवं उसका चेहरा उन वि‍चारों और भावों को प्रकट कर देता है जि‍सको वो छुपाने का प्रयत्न करता है ।

रेश्मा, तुम अपने बूढ़े मां-बाप एवं अपने आप को धोखा दे रही हो। काश तुम समझ सकती प्यार क्या होता है । प्यार वासना नहीं है, और न ही प्यार केवल शारीरि‍क मि‍लन है । प्यार एक आत्मि‍क सुख है, एक शक्ति‍ है, एक सच्ची तृप्ति‍ है, एक मन की भावना है । एक लहर है जो सुख-दु:ख की सतह से कही बहुत नीचे गहरे तल पर हि‍लोरे लेती है । शरीर रूपी साज की वह धुन है जि‍सकी आवाज से आत्मा को संतुष्टि‍ मि‍लती है । प्यार एक भक्ति‍ है, एक तपस्या है । प्यार दो आत्माओं का मि‍लन है । प्यार एक ऐसा व्यापार है जहां खोना ही पांना है, जहां देना ही लेना है ।

रेश्मा ! मेरी शादी तुमसे हो या न हो लेकि‍न मैं हमेशा तुम्हारा भला ही चाहूंगा । इसलि‍ए कहता हूं कि‍ अपने और रमेश के संबंधों के बारे में अपने माता पि‍ता को तुरन्त बता दो और यदि‍ रमेश तुुमसे शादी नहीं करता तो उसे भूल जाओ । जीवन बहुत ही छोटा है । समय ने इसे पूर्ण रूप से जकड़ रखा है ।

तुम्हारे पत्र में यह लि‍खा है कि‍ तुम रमेश को चाहती हो और उसी से शादी करोगी । रेश्मा, इसे मैं तुम्हारा पागलपन कहूं या तुम्हारा भोलापन । याद रखो, एक हाथ से ताली नहीं बजती ।

तुम आगे लि‍खती हो कि‍ तुम एक डाक्टर से शादी करना चाहती हो जो अमीर हो । बेवकूफ लड़की, मैं एक शुभचि‍न्तक की हैसि‍यत से तुम्हें यही कहूंगा कि‍ दो व्यक्ति‍यों का बंधन मन और आत्माओं का होना चाहि‍ए और प्यार का सांसारि‍क लालसाओं से क ोई संबंध नहीं । सांसारि‍क लालसाओं को पाने के लि‍ए बनाये तन के सम्बन्ध वो संतुष्टि‍ नहीं दे सकते जो मन और आत्माओं के बंधन एवं संबंधों से मि‍लते है । एक वेश्या लाख सुख सुवि‍धाओं से पूर्ण हो, पैसे वाली हो, तन-सुख हो पर वह सबसे दु:खी एवं गरीब औरत होती है । काश तुम संबंधों का वि‍ज्ञान समझ पाती । व्यक्ति‍ का डाक्टर, वकील, व्यापारी या जज-होना उतना जरूरी नहीं जि‍तना उसका अच्छा होना, सच्चा होना, ईमानदार होना । केवल पैसा ही संतुष्टि‍ और सुख नहीं देता । ऐसा होता तो हर अमीर सुखी होता, संतुष्ट होता । सांसारि‍क इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती । ये जि‍तनी ही बढ़ती जाती है उतने ही दु:ख बढ़ते जाते है
रेश्मा, मैं तुम्हारा दि‍ल नहीं तोड़ना चाहता और न ही रमेश के खि‍लाफ तुम्हें भड़का रहा हूं । अंत में तुम्हें यही दि‍ल से दुआ देता हूं कि‍ तुम खुश रहो । तुम्हारी इच्छाएं पूरी हों । तुम रमेश से शादी कर पाओं और जि‍न्दगी भर सुखी रहो ।

पत्र लि‍खकर मैने उसे लि‍फाफे में डाला और लि‍फाफे को चि‍पका कर बंद कर दि‍या । उस पर रेश्मा का पता लि‍खा और अपने कमरे की खि‍ड़की से बाहर देखने लगा । दि‍नकर अपनी सारे दि‍न की यात्रा के बाद अस्तांचल में छुपने जा रहा था । चारों ओर सांझ की लालि‍मा दि‍नकर की खुशी को दर्शा रही थी । मुझे ऐसा लगा जैसे सूर्य मुझ पर हंस रहा हो । सारे दि‍न जलने पर भी वह खुश है क्योंकि‍ उसे यह संतुष्टि‍ है कि‍ उसका जलना सार्थक हुआ । उसने खुद को जला कर संसार को रोशन कि‍या और सब को जीवि‍त रखा ।

अब सूर्य ढल चुका था । धीरे-धीरे सूर्य की लालि‍मा कम हो गयी थी । अचानक मुझे लगा कि‍ तेज हवा का एक झोंका रेत के टीले समेत उस कच्चे मकान को भी उड़ाकर कहीं दूर ले गया । अब केवल अंधकार ही अंधकार था । अब न कोई टीला था और न ही कोई मकान । बस मैं था और था चंडीगढ़ वि‍श्ववि‍द्यालय के होस्टल का वह कमरा नंबर सात । मैने लि‍फाफा हाथ में लि‍या और उसे लेकर लेटर बाक्स में डालने बाहर चल दि‍या । पत्र लेटर बाक्स में डालकर मैं अपने कमरे में आ गया । कुर्सी पर बैठकर खि‍ड़की से बाहर देखने लगा ।

बाहर रात का अंधेरा छा चुका था । यह रात का अंधेरा मुझे परेशान कर रहा था लेकि‍न मैं शांत
था, क्योंकि‍ मुझे पता था कि‍ हर रात के अंधकार के बाद सुबह का उजाला आता है । मैं उस उजाले की आस मन में लि‍ये अपने बि‍स्तर पर लेट गया ।

बड़प्पन-ड़ा प्रमोद कुमार

बड़प्पन-ड़ा प्रमोद कुमार




 

अस्तांचल ने डूबते हुए सूर्य से पूछा, "महाराज, आपके जाने के बाद इस वि‍श्व की सेवा कौन करेगा? कौन इस सृष्टि‍ को अपनी रोशनी से जागृत एवं प्रकाशि‍त रखेगा?"

धधकते एवं फड़कते हुए मि‍ट्टी के छोटे से दीपक ने जोश में आकर कहाँ, "स्वामी, आपके जाने के बाद इस दुनि‍यां की सेवा मैं करूँगा । मैं इस सृष्टि‍ को अपनी रोशनी से प्रकाशि‍त करूँगा । आप मुझे छोटा मत समझि‍ए । मैं मि‍ट्टी का हूँ तो क्या हुआ, पर इस दुनि‍या की सेवा करना खूब जानता हूँ । लेकि‍न ......." ऐसा कहते कहते दीपक मौन हो गया ।

अस्तांचल ने दीपक से पूछा, "क्यों दीपक । तुम तो बहुत डींग मार रहे थे । क्या हुआ? तुम्हारा जोश ठंडा पड़ गया?"

दीपक ने उत्तर देते हुए कहाँ, "ऐसी कोई बात नहीं । न ही मैं डींग मार रहा हूँ और न ही मेरा जोश ठंडा पड़ा है । लेकि‍न ये जो हवा है ना - हाँ, यही हवा मुझे बुझाने का यत्न करती रहती है । वैसे मुझे अपनी ज्योति‍ बुझ जाने की चिंता नही। वह तो चाहे कभी भी चली जाए । लेकि‍न मुझे चिंता तो इस बात की है कि‍ ज्योति‍ बुझ जाने के बाद इस दुनि‍याँ को रोशनी कौन देगा ।"

सूर्य भी मि‍ट्टी के फड़कते हुए दीपक की बातें सुन रहा था । अस्तांचल और सूर्य दोनों की आखों में "छोटे दीपक" की बाते सुनकर ऑसू भर आये । सूर्य ने कहा, "धन्य हो दीपक । तुम्हारे जैसों की ही इस नभ मंडल व भू-मंडल को आवश्यकता है । मैं इतना शक्ति‍शाली होता हुआ भी, जि‍सका जल, वायु, इन्द्र आदि‍ देवता भी लोहा मानते हैं, तुम्हारे आगे अपना मस्तक झुकाता हूँ ।

अस्तांचल मन ही मन सोचने लगा, - "कमाल है, कुछ तो ऐसे होते हैं जो खुद जलकर दुनि‍या को रोशन करते हैं, जीवन देते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो दूसरों को, दीपक जैसों को, अपनी स्वार्थ भरी ईर्ष्या के कारण नष्ट करने में लगे हुए हैं ।"

बांसुरीवाला-ड़ा प्रमोद कुमार

बांसुरीवाला-ड़ा प्रमोद कुमार


आज छुट्टी है और छुट्टी के दि‍न मुझे अकेले नदी के कि‍नारे घुमना बहुत अच्छा लगता है । मैंने कुछ हल्का नाश्ता कि‍या और घर से नदी की ओर नि‍कल पड़ा । नदी के कि‍नारे अचानक मुझे बांसुरी की मधुर आवाज सुनाई दी । आवाज में इतना दर्द था कि‍ मैं उसकी तरफ खींचा चला गया । पास जाकर मैंने देखा - एक व्यक्ति‍ जि‍सकी उम्र 35 - 40 वर्ष के लगभग होगी , बांसुरी बजा रहा था । लम्बा सा कुर्ता, चुडीदार पाजामा , बि‍खरे बाल और चेहरे पर खामोशी के घने बादल - वह सचमुच एक पुराने मकान की तरह लग रहा था जि‍से कि‍सी ने बहुत पहले त्याग दि‍या हो । उसकी बांसुरी की आवाज मेरे दि‍ल के जख़्मों को हरा कर रही थी । लेकि‍न मुझे आज भी याद है जब यहीं बांसुरी की आवाज मेरे दि‍ल में मोहब्बत का एक ऐसा अहसास पैदा कर देती थी कि‍ मन प्यार में डूब जाता था और खूद को खूद की खबर नहीं रहती थी । मन मस्त हवा की तरह डोल जाता रहता था । मुझे 15 साल पुरानी हर घटना चि‍त्रपट पर फि‍ल्म की तरह नज़र आने लगी ।

वह मेरा छोटा सा गाँव और पास ही नदि‍याँ कि‍नारे चांदनी का गाँव । मुझे आज भी याद है वो दि‍न जब मैंने चांदनी को पहली बार देखा था । पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता था कि‍ यहीं वह लडकी है जि‍सके लि‍ए मैंने यह जन्म लि‍या । यहीं वहीं गंगा है जहाँ मुझे मुक्ति‍ मि‍ल सकती है ।

लोग कहते हैं कि‍ हर व्यक्ति‍ में जन्मजात कुछ `ब्रेन केमि‍कल्स ' होते हैं जो उसे एक व्यकि‍त वि‍शेष की तरफ आकर्षि‍त होने को उकसाते हैं । चांदनी की तरफ मेरा आकर्षण भी कुछ ऐसा ही था । बि‍लकुल साधारण-सी थी चांदनी । लेकि‍न जाने क्यों मुझे वह दुनि‍याँ की सबसे सुन्दर औरत लगती । उसका मुस्कराना, उसका चलना, उसके हाव - भाव सब कुछ जैसे चुम्बक की तरह मुझे खिंचते थे ।

हमें जब भी मौका मि‍लता हम हरे-भरे खेतों को पार कर नदी कि‍नारे चले जाते । उसे मेरा बांसुरी बजाना बहुत अच्छा लगता था । वह बार-बार फरमाईश करती -"उस गाने की धुन बजाओ न ।" और मैं बांसुरी बजाता रहता । जब थक जाता तो मैं उसकी गोद में सि‍र रखकर लेट जाता । चांदनी धीरे - धीरे मेरे बालों में अपनी उंगलि‍यां फेरती रहती । कभी ऐसा भी होता कि‍ वह मेरी गोद में अपना सि‍र रख आँखे बंद कर लेट जाती । मैं कभी उसकी बंद पलकों को छूता तो कभी उसके होठों पर अपनी उंगलि‍याँ घुमाता । दि‍न कब ढल जाता पता ही नहीं चलता । क्या - क्या कस्में नहीं खाई हमने । साथ - साथ जीने की और साथ-साथ मरने की । तभी मुझे एक महि‍ने के लि‍ए दूसरे गांव जाना पडा, अपने मामाजी के यहाँ । एक महि‍ने के बाद जब मैं मामा के गाँव से वापि‍स आकर चांदनी से मि‍ला तो उसका व्यवहार कुछ र€खा - र€खा सा पाया । मुझे आज भी याद है वह 15 मई की शाम जब मैंने चांदनी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा था - " चांदनी अब मैं तुम्हारे बि‍ना जी नहीं सकता, मैं अपने को अपूर्ण महसूस करता हूँ ! मेरी पूर्णता तुम्हारे साथ जिंदगी जीने में है न कि‍ तुमसे जुदा रहने में ! "

लेकि‍न उसने तुरंत अपना हाथ झटकते हुए कहा था - " मैं तुमसे कोई प्यार-व्यार नहीं करती । यह तो महज एक मजाक था । "
"चांदनी, तुम यह क्या कह रही हो ? मुझे यकीन नहीं हो रहा है, क्या वे कस्मे-वादे सब झूठे थे? " मैंने क्रोध में उसके कंधों को झकझोरते हुए कहा था ।

" अरे , वह सब खेल था । महज एक नाटक था। और तुम इस नाटक को हक़ीक़त मान बैठे। सचमुच तुम बेवकूफ व्यक्ति‍ हो। " चांदनी ने दो टूक जवाब दि‍या था ।
उस दि‍न मेरे पैरों तले की ज़मीन खि‍सक गई थी । मैं पेड़ से टूटे पत्ते की तरह धरती गि‍र पडा था । और चांदनी मुझे अपने हाल पर अकेला छोड़कर चली गई ।
मैं गाँव छ़ोडकर यहां मामाजी के गांव आ गया । बहुत कोशि‍श की लेकि‍न चांदनी को भूला न पाया । ऐसा लगता है जैसे वह मेरे लहू के हर कतरे में बह रही हो । उसने मेरी रातों की नींद और दि‍न का चैन चुरा लि‍या था । मैं जिंदा लाश बन गया था। आज चांदनी से मि‍ले 15 साल बीत चुके है लेकि‍न उसकी याद आज भी मेरी जिंदगी के हर लम्हें का अभि‍न्न हि‍स्सा बनी हुई है । चांदनी की हर चीज को मैंने दुनि‍या से छुपाकर रखा है जो मेरे वास्ते अनमोल खजाना है। जब भी उसके दि‍ये पुराने गानों की कैसेट सुनता हूँ तो उसके साथ गुज़ारा हुए हर पल मेरे मानस पटल पर चलचि‍त्र की तरह अंकि‍त हो जाता है। उसका दि‍या हर तोहफ़ा उसकी बेवफ़ाई की एक लम्बी दास्तान बयां करता है। लोग कि‍तनी खुबसूरती से अपने चेहरे पर दूसरा चेहरा लगा लेते हैं, यह मुझे कभी-कभी यकीन ही नही होता ।

तभी मुझे एहसास हुआ कि‍ बांसुरीवाला वह व्यक्ति‍ मुझे टकटकी नज़र से देख रहा है । उसने बांसुरी बजाना बंद कर दि‍या था । मैंने तुरंत अपने आपको संभाला और कहा "आप बांसुरी बहुत अच्छी बजाते हैं । " मगर उसने कोई जवाब नही दि‍या ।

मैंने फि‍र बात करने की कोशि‍श की - " आपकी बांसुरी की धुन दि‍ल की गहराईयों को छू लेती है । दर्द में भी सुख का सुखद सुकून देती है । जैसे कोई रि‍सते घावों पर मलहम लगा रहा हो । "

मैंने शायद बांसुरीवाले की कि‍सी दु:खती नब्ज़ पर हाथ रख दि‍या था । उसने गम्भीर मुद्रा में कहा , " आवाज़ बेशक बांसुरी से नि‍कलती है लेकि‍न संगीत बांसुरी बजाने वाले के दि‍ल से आता है । और अगर इस संगीत में संगीतकार की आत्मा समा जाए तो वह दवा बन जाता है ।
" मुझे वह व्यक्ति‍ एक दार्शनि‍क सा प्रतीत हुआ - एक संगीत-दार्शनि‍क । मैंने उससे प्रार्थना भाव से पूछा " क्या आप मुझे संगीत सि‍खाएंगे । मुझे संगीत में बहुत रुचि‍ है । "
" ठीक है , तुम मुझे यही नदी के कि‍नारे , इसी समय ,इसी पेड़ के नीचे अगले इतवार को मि‍लो। हाँ , अपनी बांसुरी साथ लाना नही भूलना । " उस ने उठते हुए कहा ।
इस तरह मैं हर इतवार को नदी के कि‍नारे उस बरगद के पेड़ के नीचे पहुँच जाता और वहां घंटों संगीत साधना में रम जाता; रि‍याज मेरा नि‍त्यकर्म हो गया था। वह मुझे बहुत अच्छी तरह से संगीत सि‍खाता था। धीरे - धीरे हमारे बीच काफी घनि‍ष्ठता हो गई । उस का नाम ज़ैदी था । एक दि‍न मैंने पूछा , " ज़ैदी मि‍या , आप बहुत ही ग़मगी़न मि‍ज़ाज के लगते है । कोई दर्द है जो आप सीने में दबायें बैठे हैं । शायद वही दर्द आपके संगीत में लय भरता है । "

मेरी बातें सुनकर जै़दी मि‍या कुछ गुम-से हो गए । फि‍र कुछ देर खामोश रहने के बाद बोले - " मेरी नई - नई शादी हुई थी । मुझे अपनी पत्नी से अपार प्यार था । शादी के बाद चार दि‍न हम साथ रह सके। सामाजि‍क रीति‍-रि‍वाज़ों के अनुसार दुल्हन को शादी हे चार दि‍न बाद फि‍र अपने मायके जाना होता है। उसका भाई आया और अपनी बहन को लेकर चला गया । मुझे उस दि‍न बेहद अफ्सोस हुआ था। मुझे पत्नी की जुदाई का ग़म खाए जा रहा था । मैंने तुरत नि‍श्चय कि‍या कि‍ क्यों न चुपके से ससुराल जाकर पत्नी को आश्चर्यचकि‍त कि‍या जाए ? पत्नी को अपने मायके गए केवल सात दि‍न ही हुए थे कि‍ मैं पत्नी को लि‍वाने अपनी ससुराल चल पडा। मैं 15 मई की वह शाम कभी भूल नही सकता । सूर्य देवता का अस्तांचल में जाने का कुछ ही समय शेष था ।मैं खेतों के बीच की पंगडंडि‍यों से अपनी राह नि‍कालते हुए कि‍सी तूफान की तरह अपनी ससुराल जल्दी ही पहुँुचना चाहता था । मैं चांदनी के गाँव के करीब पहँुच चुका था । तभी मुझे कुछ आवाज़े सुनाई देने लगी । पास ही खेतों के बीच एक पेड़ के नीचे एक लडका और एक लड़की हाथ में हाथ लि‍ये बैठे थे। लडका लडकी से कह रहा था , " चांदनी अब मैं तुम्हारे बि‍ना जी नहीं सकता, मैं अपने को अपूर्ण महसूस करता हूँ ! मेरी पूर्णता तुम्हारे साथ जिंदगी जीने में है न कि‍ तुमसे जुदा रहने में ! "

जैदी मि‍या भावभरी मुद्रा में बोलते रहे - " मैंने ध्यान से देखा - अरे ,यह तो चांदनी हैं । मेरी पत्नी। वह दृश्य देखकर मैं चकि‍त रह गया । दि‍ल टूट चुका था। मैं तुरंत उल्टे पांव लौट पड़ा। मैं अपने गांव तो वापि‍स जा नही पाया , हाँ इसी गांव में आकर रहने लगा। शुरु में कुछ दि‍न तो मुझे बहुत बुरा लगा लेकि‍न बाद में मैंने अपने मन को समझा लि‍या । यहाँ मैंने एक संगीत वि‍द्यालय खोल लि‍या जहाँ मैं बच्चों को संगीत सि‍खाता हूँ।"

ज़ैदी मि‍या ने अपनी जिंदगी का अनुभव मुझे बाँटते हुए कहा - " मैंने अपने जीवन में यह महसूस कि‍या है कि‍ आदमी की ज़िंदगी अनमोल होती है । जि‍से कि‍सी सत्कार्य में लगाया जाना चाहि‍ए। कि‍सी खुदग़्ा़र्ज एवं बेवफ़ा के लि‍ए इसे बर्बाद करने का मतलब है ज़िंदगी की तोहि‍न करना।"

मैं ज़ैदी मि‍यां की बातें सुनकर चुपचाप सोचने लगा , "न तो चांदनी बेवफ़ा है और न ही कोई और । शायद वक्त ही है जो कि‍सी से वफ़ा नहीं कर पाया - न चांदनी से , न ज़ैदी से और न ही मुझसे ! "
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